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Dr.Padmini Kumar

Classics

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Dr.Padmini Kumar

Classics

प्रातःकाल

प्रातःकाल

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कविता का शीर्षक - प्रातःकाल

 जब मैं शिवकाशी में जगी,
 तब मैं ने कौवों का 'काँवकाँव'सुनी।
 जब मैं तिरुपुर में जगी,
 तब मैं ने मोर की आवाज सुनी।
 जब मैं मदुरवायल में जगी,
तब मैं ने कोयल की मीठा गाना सुना।
 जब मैं कोवै में जगी,
तब मैं ने कारकानों का शंखनाथ सुना।
 जब मैं तिरुपति में जगी,
तब मैं ने मधुर भरा सुप्रभातम सुना।
 जब मैं श्रीवल्लीपुत्तुर में जगी,
तब मैं ने श्रीआंडाल की पावन थिरुप्पवाई सुनी।
 कितनी पक्षी, कितनी ध्वनियाँ,
कितने गीत, कितने वाद्य,
सब तरह की आवाजों से
 इस जग को जगाने आते रहा है
 प्रातःकाल!


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