" बारिश की बूंदें "
" बारिश की बूंदें "
बारिश की बूंदों का,
उसके बालों में उलझना,
उसका तब जुल्फों को झटकना,
बूंदों का फिर ,
उसके गालों में उलझना,
तब उसका दुपट्टे से उनको पकड़ना,
फिर वो बूंदें भी तो जिद्दी होती हैं,
चूमे बिना उसके होंठों को,
बताओ भला कहां जमीन पर गिरती हैं,
वो मिट जाने को तैयार रहती हैं,
अस्तिस्व अपना खोने को तैयार रहती है,
कुछ देर और उसके तन पर रहकर,
हमेशा हमेशा के लिए,
मिट जाने में खुश रहती हैं,
वो बारिश की बूंदें,
उसकी पलकों में भी,
मोती बनकर चमकती हैं,
तभी पड़ जाए यदि,
कोई किरण उन पर तो,
पूरा श्रृंगार बन जाती हैं,
ये बारिश की बूंदें,
उन पर मचलती हुई,
हर बार हमें जलाकर,
बताओ खुद मिट जाती हैं।

