Dr Jogender Singh(jogi)
Tragedy
फुसफुसाया कोई, रुक जा
ठहर ज़रा , कहा तूने
जान बूझ, मैंने सुना नहीं।
संभालते मुझे , गिर पड़ा तू।
मैंने तुझे , संभाला भी नहीं।
रोने की आवाज़ सुनी नहीं,
सिसक सिसक कर रोया तू।
उम्मीद तो होगी , मैं आंसू पोंछूंगा।
रुमाल भी, मैंने निकाला नहीं।
नींद
गुरु
कैसी दीपावली
आखिरी जेवर
सुबह
भुल्लन
खिड़की की जाल...
विस्तार
बेपनाह
दूर नहीं तू
तू भीड़ में भी अकेला। मेरे हिस्से आई तन्हाई। तू भीड़ में भी अकेला। मेरे हिस्से आई तन्हाई।
बात यही है अब , तुम्हारी तुम जानो अब। बात यही है अब , तुम्हारी तुम जानो अब।
हर मन में संघर्ष है, उन्हें अपनों से ही विमर्श है। हर मन में संघर्ष है, उन्हें अपनों से ही विमर्श है।
दिनकर की कविता पाठ हूं गंगाधर के वचन चौहान का मैं साथ हूं। दिनकर की कविता पाठ हूं गंगाधर के वचन चौहान का मैं साथ हूं।
नकारात्मकता मिटा भीतर वन को कैसे न खिलेगा फूल,पतझड़ को। नकारात्मकता मिटा भीतर वन को कैसे न खिलेगा फूल,पतझड़ को।
दिल के टुकड़े मेरे समेटने तो दो मुझे संभलने का एक मौक़ा तो दो। दिल के टुकड़े मेरे समेटने तो दो मुझे संभलने का एक मौक़ा तो दो।
एक वृद्धा आई नज़र फ़ुटपाथ पर बैठी ! एक वृद्धा आई नज़र फ़ुटपाथ पर बैठी !
जीवन को तुम्हारे शुक्ष्म ऊर्जा जो अब वातावरण अपना आज खोता चला जा रहा। जीवन को तुम्हारे शुक्ष्म ऊर्जा जो अब वातावरण अपना आज खोता चला जा रहा।
तुम ये मत सोचना मैं मरी हूं अपनी मर्जी से तुम ये मत सोचना मैं मरी हूं अपनी मर्जी से
तिमिर-तिमिर कर भावनाओं से, विचारों में उलझता चला जा रहा। तिमिर-तिमिर कर भावनाओं से, विचारों में उलझता चला जा रहा।
लक्ष्य प्राप्ति हेतु तू सज्जन बढ़ाता रह निरंतर तू कदम ऐसी लगा ले, लक्ष्य प्राप्ति हेतु तू सज्जन बढ़ाता रह निरंतर तू कदम ऐसी लगा ले,
हर पल, हर क्षण भूल जाती ये ही जीवन की लीलाएँ जो रुकती नहीं। हर पल, हर क्षण भूल जाती ये ही जीवन की लीलाएँ जो रुकती नहीं।
वह मुझे पिंजरे में रखता तो मगर उड़ने देता जब उसका मन होता। वह मुझे पिंजरे में रखता तो मगर उड़ने देता जब उसका मन होता।
जो दे, बीच राह, सबको व्यर्थ ठोकर उन पत्थरों के टुकड़े कर दे, तू सत्तर जो दे, बीच राह, सबको व्यर्थ ठोकर उन पत्थरों के टुकड़े कर दे, तू सत्तर
काश ! ऐसी कोई जगह हो जहां पर, दिल को थोड़ा सा सुकून मिल जाए। काश ! ऐसी कोई जगह हो जहां पर, दिल को थोड़ा सा सुकून मिल जाए।
पर मन पे जब कोई घाव लगता है, तो वो कभी नहीं भर पाता है। पर मन पे जब कोई घाव लगता है, तो वो कभी नहीं भर पाता है।
ये दुनिया ....एक चढ़ाचढ़ी का मेला , यहाँ हर कोई किसी ...दूसरे पर है चढ़ रहा. ये दुनिया ....एक चढ़ाचढ़ी का मेला , यहाँ हर कोई किसी ...दूसरे पर है चढ़ रहा.
उस दिन होगी इच्छा मृत्यु देह की ज़रूरत नहीं। उस दिन होगी इच्छा मृत्यु देह की ज़रूरत नहीं।
दर्द से कराहती वस्त्रहीन स्वयं को अकेली ही पाती हैं दर्द से कराहती वस्त्रहीन स्वयं को अकेली ही पाती हैं
हौसलों से मृत जीवन में जान फूंकों मृत्यु सामने हो, तो भी हंसी न छोड़ो। हौसलों से मृत जीवन में जान फूंकों मृत्यु सामने हो, तो भी हंसी न छोड़ो।