अनकही प्रेम कहानी
अनकही प्रेम कहानी
घर के पीछे लगी दूब में
ओस की बूंदों की तरह तुम चमकती हो
मन के मरुस्थल में
बादल बनकर जब बरसती
ठंडी शीतल सी नदी तुम लगती हो
सागर की हर लहरों संग
तुम जब टकराकर मुझसे जाती हो
मन के कोमल भावों को जगाती पर
रेत पर प्यार के निशां बनाती हो
लगता जैसे दिल की बातें सब तुम समझ जाती हो
इन्द्रधनुष के रंगों सी
सभी रंग तुम्हारी पवित्रता का संकेत देते
आकाश में रंगों का समागम कुछ ऐसा दिखता है
जैसे हर रंग संग जैसे मुझसे कुछ तुम कहती हो
रूप निहारता जब रंगों का
दिल के हर कोने में तुम बसती हो
कहीं दूर आसमान में चमकते तारे
तुम्हारा अहसास दिलाते हैं
उस घनेरी रातों में मेरी बाहों में आ जाते हो
बात जब होती प्यार भरी
फिर धीरे धीरे चाँद के आँचल में कहीं छिप जाती हो।

