अनजान
अनजान
उससे बिछड़कर मैं,
स्वयं से ही अनजान हो गया हूं।
गम दर्द बेचैनी तन्हाई,
इन सब का पहचान हो गया हूं।
घर भी खंडहर हो गया है,
खंडहर सा मैं वीरान हो गया हूं।
हँसना बोझ लगता है,
मैं तो दर्द का जहान हो गया हूं।
गम साथ में ही रहता है,
गम के लिए मेहमान हो गया हूं।
उसकी याद बहुत आती हैं,
उसके बिन परेशान हो गया हूं।
उससे बिछड़कर मैं,
स्वयं से ही अनजान हो गया हूं।
