अख़बार की ताज़ा खबर
अख़बार की ताज़ा खबर
अक्सर रोज सुबह चाय की चुस्कियों के साथ,
हाथ में अखबार लिए खबरों पर निगाहें दौड़ती हैं,
प्रथम पृष्ठ से अंतिम पृष्ठ तक,
तो दिल सहर जाता है,
कांप जाता है,
कभी कभी धडकनों के रुकने की आवाज भी,
अपने खुद के कानों तक सुनाई पड़ती है,
तब एकाएक मन में विचारों का पुलिंदा,
आंखों के सामने नजर आने लगता है,
और दिल बोल पड़ता है,
क्या ये ही आज की ताज़ा खबर है,
किसी पृष्ठ पर किसी के क़त्ल का जिक्र होता है,
तो कहीं पैसों की लूटमार की खबर छपी होती है,
तो कहीं छपा होता है,
सरेराह आबरू को रौंदा गया हवस के दरिंदों द्वारा,
किसी पृष्ठ पर कोई मजलूम लटका होता है
अपने ही गमछे से दुनिया से हार कर,
तो कहीं दुर्घटना के शिकार लोगों का जिक्र
जो होते हैं, भ्रष्ट सरकारी तंत्र की नाकामियों से,
कहीं किसानों की हालत पर रोना लिखा होता है,
तो कहीं किसी अमीर बाप की बिगड़ी औलादें,
किसी गरीब को रौंद कर भाग गए होते हैं,
खबर छपी होती है हर पृष्ठ पर,
दंगों का जिक्र है,
तो कहीं इंसाफ के लिए भटक रहे मां बाप का संघर्ष,
तब लगता है क्या यही समाज का रूप है,
जो अखबारों के लिए सूचना का स्रोत है,
कहां जा रहा है हमारा समाज,
क्या भौतिकता ही सब कुछ है हमारे लिए,
जो हावी है हम पर,
घुस गई है हमारे मन मस्तिष्क में दीमक की तरह,
क्यूं संस्कृति से कटाव हो रहा समाज का,
क्यूं नैतिकता घुटनों के बल रेंग रही है
क्या यही समाज हम अपने भविष्य के लिए बना रहे हैं भूत और वर्तमान पर हावी होकर,
हर जगह मारामारी की स्पर्धा हो रही है
किसी को किसी के मनोभाव का कोई इल्म नहीं,
हर कोई आगे बढ़ने के लिए दूसरों का गला काट रहा है,
भावनाओं का कतल हो रहा है सरे आम,
पर फर्क किसी को नहीं पड़ता
पड़े भी क्यूं,
हमाम में सभी नंगे जो ठहरे,
इस समाज में,
और अखबार इसी नंगे समाज की खबरें रोज पेश करेगा
बेखौफ होकर.............???????????
