बस इतना ही काफी है.!
बस इतना ही काफी है.!
ना उम्मीद रखता हूं मैं
ना खुद से कोई ख्वाइश,
ना कल की चिंता करता मैं
ना कोई रखता फरमाइश।
जो मिल जाए राहों में
हंसकर उसको ले लेता हूं,
छोटे-छोटे लम्हों में
मैं खुद को जी लेता हूँ।
न सूरज से शिकवा करता हूं
न किसी से कोई गिला,
जो दर्द सीने में छिपा है
वो मुझे मेरी तकदीर से मिला।
हवा जैसा हूं मैं
बस आता जाता रहता हूं,
मन का दीपक खुद ही मैं
मैं अपने अंदर जलाता हूं।
ना महलों के सपने देखता हूं
ना मुझे ताज की कोई आस,
मिट्टी की खुशबू में मैं
रखता सदा पूरा विश्वास।
रोटी सादी खाता हूं
नींद सुहानी लेता हूं,
खुली आंखों से भी मैं
सपने नित बुन लेता हूं।
जो खो गया मेरा कभी
उसे अब जाने देता हूं,
जो पा लिया मैंने अब
उसे सीने में छिपा लेता हूं।
भीड़ में भी मैं मगर
रहता अब तन्हा नहीं,
अपने भीतर की बातों को
करता मैं किसी से बयां नहीं।
मुस्कुराकर बढ़ता जाऊं मैं
करता अब यही तमन्ना,
अपने कर्मों से लिखूंगा मैं
अब जीवन का हर पन्ना।
ना उम्मीद रखता हूं मैं
ना खुद से कोई ख्वाइश,
बस जिऊं मैं ऐसे ही
यही खुद से मेरी फरमाइश।
