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संजय असवाल "नूतन"

Abstract Fantasy Others

4.5  

संजय असवाल "नूतन"

Abstract Fantasy Others

अनकही मोहब्बत..!

अनकही मोहब्बत..!

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ना तुम्हें कभी कहा मैंने

पर जज्बातों में तुम ही थे…

मेरे लफ़्ज़ खामोश रहे बेशक

पर तेरे ख्यालों में खोए हम ही थे।


तुमसे बात करने की ख्वाहिश

हर दिन दिल में जगती रही,

पर होंठों तक आते आते

वो चाहत कहीं थमती रही।


जब तुम हंसती तो लगता था

दुनियां मेरी रोशन हो गई,

और जब तुम खामोश होती

तो लगता धड़कन कहीं मेरी खो गई।


मैंने चाहा बहुत कि कह दूं तुमसे

कि तुमसे मोहब्बत है मुझे,

पर डर था कहीं ये लफ़्ज़ मेरे

दूर ना कर दे मुझे तुझसे।


इसलिए चुप ही रहा मैं भी

तेरी हर बात को सुनकर,

तेरी हर मुस्कान में फिदा मैं 

देखता रहा तुझे छुप कर।


पर शायद तुम कभी समझ पाती

मेरी खामोशियों की जुबां को,

तो लफ़्ज़ों की ज़रूरत ही क्या थी

इस अधूरी सी दास्तान को।


मैंने हर धड़कन में तुम्हें रखा

हर ख्वाब में तेरा ही नाम था,

तुमने काश पढ़ लिया होता

जो दिल में तुम्हारे लिए पैगाम था।


काश एक पल ठहर कर तुम

मेरे धड़कनों की सारगोशी सुन पाती,

ये खामोशी ना सिसकती बेवजह

जो तुम मेरी रूह तक उतर पाती।


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