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संजय असवाल "नूतन"

Abstract Classics Fantasy

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संजय असवाल "नूतन"

Abstract Classics Fantasy

कुछ मोहब्बतें अधूरी अच्छी लगती हैं।

कुछ मोहब्बतें अधूरी अच्छी लगती हैं।

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उनको भी हमसे मोहब्बत हो,

ज़रूरी तो नहीं,

वो भी टूटे दिल से रोएँ,

ज़रूरी तो नहीं।

हमने ख़्वाबों से सजाई हैं

कई तन्हा रातें,

उनकी आँखों में भी सपने हों,

ज़रूरी तो नहीं।

हम ही हर दर्द को

चुपचाप सहा करते हैं,

वो भी अश्कों को छुपाएँ,

ज़रूरी तो नहीं।

इश्क़ एक तरफ़ा ही सही

मुकम्मल सा लगे,

हर कहानी में दो दिल हों,

ज़रूरी तो नहीं।

चाँद तन्हा भी चमकता है

अँधेरी रातों में,

हर सितारा साथ आए,

ज़रूरी तो नहीं।

हमने उनकी चाहत को

इबादत माना,

उनको भी ये समझ आए,

ज़रूरी तो नहीं।

दिल की गलियों में

कई ख़्वाब बिखरे हैं यहां,

हर बिखरा ख़्वाब फिर सँवर जाए

ज़रूरी तो नहीं।

कुछ खामोश से सफ़र यहां

अकेले ही तय होते हैं,

हर कदम पर कोई ठहरे,

ज़रूरी तो नहीं।

हमने हर मोड़ पे

बस उनका नाम लिया,

वो भी हर साँस में पुकारें,

ज़रूरी तो नहीं।

इश्क़ किस्मत है यहां

शिकायत नहीं की जाती,

हर दुआ पूरी ही हो जाए,

ज़रूरी तो नहीं।

वक्त सिखला ही देता है

मुस्कुराना फिर से,

हर ज़ख्म उम्रभर दुखाए,

ज़रूरी तो नहीं।

कुछ मोहब्बतें

बस एहसास बनकर रहती हैं,

हर मोहब्बत को मुकाम मिले,

ज़रूरी तो नहीं।


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