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संजय असवाल "नूतन"

Abstract Romance Fantasy

4.5  

संजय असवाल "नूतन"

Abstract Romance Fantasy

तुम देर से मिले..!

तुम देर से मिले..!

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तुम देर से मिले,

इतनी देर से,

कि ज़िंदगी आधी धूप में जल चुकी थी,

और आधी.....

यादों की ठंडी राख बन चुकी थी।

फिर भी जब तुम आए,

तो लगा जैसे....!

बरसों से बंद पड़े किसी कमरे में

एक खिड़की अचानक खुल गई हो,

और....!

भीतर रोशनी ने धीरे से मेरा नाम पुकारा हो।

तेरे ख़्वाबों में बसने की चाहत थी,

तेरे साथ,

उम्र गुज़ारने की एक मासूम सी ज़िद थी,

हँसने की, रूठने की,

बेवजह तुमसे लड़ने की 

और फिर

तेरी बाँहों में सिमट जाने की दिली ख्वाइश थी।

मगर तुम, 

बहुत देर से मिले…!

जब हमारे राहों ने

अपनी-अपनी मंज़िलों से समझौते कर लिए,

जब वक़्त ने हथेलियों पर

कुछ अधूरे रिश्तों की 

लकीरें खुद लिख दिए।

कई बार सोचा,

काश तुम पहले मिल जाते…

तो शायद ये दुनियां इतनी खाली न लगती,

शायद हर शाम का रंग 

थोड़ा और सुनहरा होता,

शायद रातें इतनी तन्हा न बीततीं।

तुम्हारे आने के बाद जाना,

कि मोहब्बत सिर्फ़ साथ रहने का नाम नहीं,

कभी-कभी ये उस दर्द का नाम भी होती है

जिसे हम 

मुस्कुराकर छिपा लेते हैं।

अब बस एक दुआ है उस रब से,

अगर अगला जन्म 

सच में कहीं लिखा जाता हो,

तो तुम मुझे थोड़ा जल्दी मिलना,

इतना जल्दी,

कि इस बार कोई ख़्वाब अधूरा न रह जाए,

आंखों से गिरा आंसू बीच में ना कहीं सूख जाए।

इस बार पहली खुशी से आख़िरी साँस तक

बस मेरा हाथ थामे रहना,

मेरी हर ख़ामोशी में खामोश रहना,

और मेरी खुशी में खुश होना,

और जब दुनियां बदलने लगे,

साथ एक दूजे का छूटने लगे,

तब भी मेरे हिस्से की मोहब्बत बने रहना।

क्योंकि इस जन्म में

तुम देर से मिले…

पर इतने खूबसूरत मिले,

कि तुम्हारे बाद..!

किसी और की दुआ की चाह भी ना रही।


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