प्रकृति का मौन संगीत
प्रकृति का मौन संगीत
गर्मियों की दोपहरी में हर दिन
सूरज अंगारों सा जलता था,
धरती की सूखी साँसों में एक
अधूरा सपना सा पलता था।
मैं पगडंडी पर चलते चलते
जंगल की गोद में सोया था,
पत्तों की सरसराहट में
मैं अपने ख्यालों में खोया था।
फिर अचानक बादल घिर आए
प्रकृति ने खुश हो आशीष दिया,
पहली बूंद गिरी ज्यों माथे पर
बारिश ने माथा मेरा चूम लिया।
फिर झमाझम बारिश उतरी
तप्त हवा का क्रोध पिघलाया,
हर पत्ती ने भी आँखें खोलीं
हर तिनके ने मधुर गीत सुनाया।
मिट्टी की सौंधी खुशबू ने फिर
मन का हर कोना भर डाला,
प्रकृति के इस अद्भूत रूप ने
आश्चर्य चकित सा कर डाला।
बारिश थमी तो चारों ओर
एक शांति की चादर बिछ गई,
न कोई शोर न कोई हलचल
बस हरियाली हर ओर सज गई।
उस नीरवता में लगा मुझे
जैसे सारा जग थम सा गया,
प्रकृति खुद जब बोल उठी
मन मेरा भीतर से रम गया।
गर्मियों की उस तपन में
छू गया बरखा का यह मधुर स्पर्श,
सिखा गया हर सूखे पल में
आता है जीवन का नव उत्कर्ष।
