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संजय असवाल "नूतन"

Abstract Fantasy Others

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संजय असवाल "नूतन"

Abstract Fantasy Others

वो नंबर..जो अब भी सांस लेता है।

वो नंबर..जो अब भी सांस लेता है।

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मैंने तुम्हारा फोन नंबर 

कभी डिलीट ही नहीं किया,

क्योंकि कुछ चीज़ें मिटाई नहीं जाती

बस धीरे-धीरे अंदर दफ्न हो जाती हैं।


वो आज भी वहीं पड़ा है 

फोन डायरी के एक अंधेरे कोने में,

जहां कोई नोटिफिकेशन नहीं आता

पर दिल धड़कना अक्सर भूल जाता है।


कभी कभी उंगलियां खुद-ब-खुद

तुम्हारे नाम तक पहुंच जाती हैं,

जैसे कोई आदत हो इन्हें

बिना आवाज़ के तुम्हें छू लेने की।


मैं स्क्रीन पर तुम्हारा नाम देखता हूं 

तो पूरा अतीत सामने आ जाता है,

हंसी के वो छोटे टुकड़े,रातों की लंबी बातें,

और वो खामोशियां जो बहुत कुछ कहती थीं।


कितनी अजीब बात है ना

एक वक्त था जब तुम्हारी एक कॉल,

मेरी पूरी दुनिया बदल देती थी

और आज मैं खुद को समझाता हूं 

कि एक कॉल से सब फिर टूट जाएगा।


मैंने तुम्हें भुलाने की कोशिश नहीं की

क्योंकि सच तो ये है

तुम्हें भूलना,

खुद का एक हिस्सा खो देना होता।


इसलिए तुम आज भी हो

ना मेरे पास

ना मुझसे दूर…

बस एक नंबर बनकर,

जो कभी डायल नहीं होगा,

पर हर रोज़ दिल में धड़कता रहेगा।


शायद सच यही है

कुछ रिश्ते खत्म नहीं होते,

बस उनकी आवाज़ चली जाती है…

और हम उन्हें

अपने अंदर चुपचाप सुनते रहते हैं।


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