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Aditya yadav

Abstract

4.6  

Aditya yadav

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ओ री लता!

ओ री लता!

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सुनहरी, चमकीली, सुंदर पंखुड़ियां तेरी,

ओ री लता ! तुझपे भँवरे मंडराते होंंगे।

मृदुल रस कानो में तेरे,

कोई राग वे सुुनाते होंगे,

ओ री लता! तुझपे भँवरे मंडराते होंंगे।


कल गान के बहकावे मे लता तू आ जाती होगी,

मकरंद पान कर वे मदिर भँवरे उड़ जाते होंगे,

ओ री लता ! तुझपे भँवर मंंडराते होंंगे।


प्रणयातुर तू भी उन्हें बुुलाती होगी,

पर मदिर भँवरे तुझे बावली समझ चिढा़ते होंगे,

ओ री लता ! तुझपे भँवरे मंडराते होंंगे।


लज्जा के मारे तू भी अपनी कलिकाएँ

सम्पुटित कर लेती होगी,

मुरझा के गिर जाती होगी जब 

लाख यत्न करने पर भी वे न आते होंगे,

ओ री लता ! तुझपे भँवरे मंडराते होंंगे।


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