STORYMIRROR

Abasaheb Mhaske

Tragedy

3  

Abasaheb Mhaske

Tragedy

अब तो हमारी जान बक्श दे

अब तो हमारी जान बक्श दे

1 min
296

तू घर का ना घाट का

गुफा का ना समाज का

ना अच्छा इंसान बना

ना अच्छा दोस्त बना


तू अपनों से दूर भाग आया

सुकून की जिंदगी जी न पाया

ख़ुशी तो बिखरी थी इधर उधर

तू अज्ञान से दर बदर ढूंढ़ता रहा


तू हमेशा अंतमुग्ध रहा

चाटुकार से प्रसन्न हुवा

तेरा हर दांव नाकाम रहा

सोच तूने क्या खोया पाया ?


छोड़ अहंकार प्यारे अब तो

वर्ना नहीं बचेगी मानवजाति

तो क्या कंकर पत्थर , पेड़ पौधे

तेरा गुणगान गायेंगे सोच ले


कुछ हटके कर दिखाने के ख़ातिर

तूने सब की मेहनत पे पानी फेरा बेशक

तानाशाही से लेकर तू बना सरफिरा

अब तो हमारी जान बक्श दे दोस्त।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy