आवाहन।
आवाहन।
जनम जनम से भटक रहा, प्रभु! तेरे दर्शन की आस लिए,
समय चक्र बड़ा बलवान, समझ न पाता इसकी चाल।
उलझा रहा निस्वार्थ कर्मों में, ले न सका कभी तेरा नाम,
निर्मल अंतर्मन न कर पाया, बड़ा बुरा है अब मेरा हाल।
कर्तापन ने अहंकार उपजाया, अपनों को ही गले लगाया,
पर सेवा, परहित न जाना, मोह माया ने फेंका जाल।
पशुवत जीवन अपना कर डाला, घृणा, द्वेष की पहनी माला,
हार चुका खुद अपनों से ही, बना हुआ अब जी का जंजाल।
मन के सारे भेद मिटा दो, अपने चरणों में मुझे बुला लो,
कमलावत जीवन मेरा कर दो, भक्ति वर दे कर दो निहाल।
साम्यअवस्था जीवन की कर दो, हृदय अब प्रकाशित कर दो,
मीत बना लो अपने मन का, जर्जर काया अब धूमी चाल।
चाहत नहीं अब कुछ पाने की, आत्मशांति का दो वरदान,
विनय, दीनता मन में उपजे, समर्पण भाव हो चिरकाल।
परमार्थ पथ की राह दिखा दो, आवागमन चक्र मिटा दो,
"नीरज" करता गुरु "आवाहन" अब तो आकर मुझे संभाल।
