STORYMIRROR

Madhu Gupta "अपराजिता"

Classics Fantasy

4  

Madhu Gupta "अपराजिता"

Classics Fantasy

आत्मा..!!

आत्मा..!!

2 mins
13

जब थक जाओ सच झूठ के जाल से                         

और बेचैनियां लिबास की तरह लिपटने लगे 

बसने लगे दर्द आँखों में

और कानों में भय के खंजर चुभने लगे 

जब जीती बाज़ी लगो हारने 

और चरमराने लगे विश्वास की पकडंडी

तब चले आना..... 


जब चलते-चलते ठोकर खाकर गिर जाओ 

और आँखें आंसुओं से दबदबा जाए 

ढूंढे किसी का चेहरा

जब छोड़ दे साथ ज़माना 

ना दिखे कोई रास्ता 

और रास्तों की उम्मीद हो जाए ख़तम

तब बड़ते चले आना...... 


जब डराने लगे अपना ही साया 

और सच्च-झूठा का फ़र्क आने लगे समझ 

जब खुशी और दुख साथ जीने लगो 

जब राहों में चुभने लगे कांटे 

और फूलों की अहमियत आने लगे समझ 

जब लगने लगे सपने झूठे

तब चले आना... 

जब हारने लगो खुद से 

और नजर ना आए कोई मनोबल बढ़ाने वाला 

जब कचोटने लगे अंधेरा

और दुनिया से हो उठे विरक्ति

उठ जाये खुद से विश्वास

तब चले आना.... 

मैं जीवित हूं अभी भी तुम्हारे अंदर 

दूंगी सहारा तुम्हें दिखाऊंगी रास्ता 

और बताऊंगी सच की अहमियत

तुमको ले चलूंगी उस जहां 


जहां तुम अपने आप को जान पाओगे 

जहां समझ सकोगे गलत और सही का मतलब 

जहां तुम्हें रोशनी दिखेगी सच्चाई, प्रेम, 

करुणा और दया की 

जहां झूठ और छल का जरा भी ना होगा स्थान

जहां होगा तो बस प्रेम

जहाँ ना होगी फ़रेब की कोई जगह


मैं मिलूंगी तुमको वहीं तुम्हारे मन के कोनों में

निर्भीक निडर और सहास का दामन थामे

तुम्हारे लौट आने का करती इंतजार....

और जब तुम एक छोटे बच्चों की तरह 

मासूम भावनाओं को लिए वापस आओगे 

तो भर लूंगी अपनी बाहों में 

हर पल तुम्हारा रास्ता देखती 


आज तक अनसुनी की जो मन की आवाज़ 

जब वो आ जाए समझ

तब समझ लेना तुम सही रास्ते चले आ रहे हो 

उस वक़्त पीछे मुड़कर मत देखना 

और चलते चले आना 

मैं मिलूंगी तुमको वही मन के कोने में

तुम्हारी बची- खुची अच्छाइयों के साथ !


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Classics