आंसू
आंसू
कल कहा
मैंने आंसुओं से
बरसते क्यों हो
बिन बादल
बरसना है तो बरसों
किसान के खेत में
कभी किसी प्यासे को
देखा है तड़पते
अभी जाकर
उसकी प्यास बुझाओ
सच कहता हूँ
बेइंतहा सुकून मिलेगा
मैंने कहा था
जब आयें प्रीत मेरे
तब मत बरसना
मगर तुम बरस गए
पिया मिलन की आस
आज भी अधूरी है
बादलों की बेरुझी से
मुरझाई है धरती
सूख कर ज़मीं बंज़र
जाकर बरसो इस सावन
धरती की गोद में
लौटा दो फिर हरियाली।
