आख़िरी दरख़्त
आख़िरी दरख़्त
जा पहुंचा उस जंगल, जहां दरख्त बोलते थे,
दरवाजे बचपन में खुशियों के सारे खोलते थे,
संग मेरे आसमां तक वो मिल सारे डोलते थे,
जो बोलता था मैं वह भी साथ सारे बोलते थे।
लहकती थी बहार जहां शाखों पर हर तरफ,
आज उन शाखों पर न एक भी पत्ता रह गया,
चहचहाते थे पंछी जहां घोंसलों में हर तरफ,
ना उन डालों पर आज एक भी नीड़ रह गया।
देखता हूं वो दरख्त जो ठूंठ बनकर रह गया,
बुलन्द था जो कभी आज रेत बनके ढह गया।
पूछा मैंने उससे वो जंगल आखिर किधर गया
देखते ही अपना जान, वो दर्द से बिफर गया।
कभी था जो सच आज झूठ बनकर रह गया,
मौसमों की बेरुखी था जो तनकर सह गया,
इमारतों की बाढ़ में वो जंगल सारा बह गया।
बस मैं हूं वो दरख़्त जो यहां आखिरी रह गया।
