आज़ादी को दावत दो
आज़ादी को दावत दो
कुछ पंख कटी चिड़ीयों का आह्वान स्वीकार करो,
आधिपत्य के अधिष्ठाताओं मुक्त गगन की खिड़की को आधी तो खोल दो।
कुछ आँखें तमस घिरी ज़िंदगी को सहते अंधी हो चुकी है,
छोटे से कमरे के किसी एक कोने में रोशन ऊर्जा का संचार भर दो।
मुरझा रही है अपने ही बाग में कलियाँ कुछ कातिल भँवरे की तीखी नज़रों से,
मासूम को रक्षित करे पनाह में लेकर ऐसा महफ़ूज़ कोई वितान तो दो।
प्रताड़ना पुरजोर पनपती जश्न मनाती पल रही
सीमा लाँघ रही है वहशीपन की विकृति भरी कहानीयाँ,
देकर पूर्णता अंत सुखद भर ऐसा कोई मोड़ तो दो।
ये कैसी आग है जो बुझती ही नहीं मसली ही जाती है मोम सी गुड़िया,
ठंडी अब राख हो ऐसा कोई आबशार तो दो।
बह रही है पन्नों से बू विमर्श की छंटे शब्दों का जाल और
आज़ादी का गीत बहे, ऐसे सुंदर समय को कोई दावत तो दो।
