Hurry up! before its gone. Grab the BESTSELLERS now.
Hurry up! before its gone. Grab the BESTSELLERS now.

Akanksha Gupta (Vedantika)

Abstract


4  

Akanksha Gupta (Vedantika)

Abstract


आईने में भी तन्हा

आईने में भी तन्हा

1 min 268 1 min 268

आईने में भी तन्हा हूँ मैं कितने बरसों से

परछाई भी मेरी होकर मेरी क्यों नहीं है


जी रही हूँ मैं किसी की जरूरतों में अक्सर

किसी को भी यहाँ मेरी ज़रूरत क्यों नहीं है


आईने के उस पार जो बसी है एक दुनिया

दिखता है मकान वो मेरा घर क्यों नहीं है


गुजर गया है वक़्त लेकर मेरी ख़्वाहिशों को

ख़्वाहिशों से गुजरने का वक़्त क्यों नही है


सवाल करता है ये आईना अब मुझसे हर पल

जो दर्द को बेपर्दा कर दे वो आईना क्यों नहीं है


Rate this content
Log in

More hindi poem from Akanksha Gupta (Vedantika)

Similar hindi poem from Abstract