आईना !
आईना !
कभी ये चेहरा
गुरूर करता था खुद पे
हरदम
देखा करता था आईना
बड़ी नज़ाकत से !
देखकर खुद को
मुस्कुराता था
खुश होता था
खुद ही खुद पर
होता था फ़िदा !
आज मगर हाल ये है
देखता नहीं आईना
अगर देख लिया गलती से
तो खुद ही खुद से
चुराने लगता है निगाहें
देख लिया हो
जैसे कुछ अनचाहा
फ़ौरन हट जाता है
आईने के सामने से !
लेकिन
आईना भी कम नहीं
जब तब
मुंह चिढ़ाता हुआ
पड़ जाता है सामने !
