STORYMIRROR

Krishna Khatri

Classics

4  

Krishna Khatri

Classics

यही इल्तिजा है !

यही इल्तिजा है !

1 min
243

ये सूखे पत्ते 

आते हैं

जब पैरों के नीचे

चरमराते हुए कहते हैं मुझसे


हम भी थे कभी हरे-भरे

थी रवानी हम पर भी

इस तरह न रोंदो हमको !


माना कि

आज हम खड़े हैं

जिन्दगी के आखिरी कगार पर 

फिर भी जान तो है 


तमन्ना भी रखते हैं जीने की

बस यही इल्तिजा है

हमको भी जीने दो

यूं तो न रोंदो हमको !


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Classics