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Devendraa Kumar mishra

Tragedy

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Devendraa Kumar mishra

Tragedy

आग

आग

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जब जब तुम्हारी महफिल सजती है 

तब तब गुलशन में आग लगती है 

जब जब ऊंची होती है तुम्हारी मीनारें  

गरीबों के झोपड़ों पर गाज गिरती है 


जब जब तुम मंजिलों पर पहुंचते हो 

हमारी जिंदगी रास्तों पर भटकती है 

जब जब फसल चौपट होती है किसान की 

तुम्हारे कर्ज माफी के वादे के बाद भी

ब्याज की दरें बढ़ती हैं 


तुम्हारे सारे अभियान जिंदाबाद होते हैं 

हम तो एक वक़्त की रोटी के लिए तरसते हैं 

तुम्हारे सेंसेक्स, बाजार के उछाल तुम्हें मुबारक हों 

दो वक़्त रोटी मिल जाए तभी खुशी मिलती है 


सोया हूं, मरा नहीं हूँ अभी 

तुम्हें श्रद्धांजली देने की बड़ी जल्दी होती है 

आकर करे कोई हमारा भी इन्साफ 

हमारा हक आपकी फाइलों में लटकी होती है 


तुम्हारा विकास ठीक है अपनी जगह 

जीने के लिए आक्सीजन जरूरी होती है 

जब जब सजती है तुम्हारी महफिलें 

हमारी जी भर के रुसवाई होती है।


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