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पङोसी की कार
पङोसी की कार
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© Atul Agarwal

Romance

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हमारे बाएं पड़ोस में एक गर्ग फेमिली है। आपके ६ साल का १ लड़का हैं और आपके पास एक ४ सीटर कार है। आवश्यक्तानुसार कार में आपके परिवार के अतिरिक्त २ बड़े और ठूसे जा सकते हैं। दायें पड़ोस में एक नवदम्पति वर्मा फेमिली है।

हमारा परिवार बीच में रहता है, जिसमे बच्चो की शादी के बाद हम दो अधेड़ ही है। श्री अग्रवाल ५८ वर्षीय और श्रीमती अग्रवाल ५२ वर्षीय।

इस प्रकार तीन परिवारों में कुल मिलाकर ७ प्राणी। तीनो परिवारों में खूब छनती है। अच्छे मित्र भात्रवर्त, वो अलग बात है की आदतन पीठ पीछे सब एक दूसरे की बुराई करते। ख़ास कर की घरातिने।

एक दिन पिकनिक का प्रोग्राम बना. एक विकल्प था की एक पडोसी की कार और एक ओला की टैक्सी कर ली जाये. दूसरा विकल्प सस्ता था, जिसमे श्रीमती अग्रवाल, यानी की हमारी धर्मपत्नी, श्रीमती वर्मा, पडोसी श्री गर्ग की कार में उनके बच्चे के साथ पीछे बैठ जाए और श्रीमती गर्ग कार मालिक अपने पति कम ड्राईवर के साथ आगे और हम और श्री वर्मा जी मोटरसाइकिल पर। कुल ९ किलोमीटर की ही तो बात थी। और इससे टैक्सी का लगभग १५० रुपया भी बच रहा था.दूसरा विकल्प कार्यान्वित किया गया। कानपुर के कालपी रोड पर अर्मापुर एस्टेट में एक रेस्टोरेंट में मुगलई खाया गया। खाने के बाद हमारी पत्नी हमे एक किनारे अकेले में ले गई और फुसफुसा के आग्रह किया की ओला की टैक्सी कर लो। हमने पूछा की क्या बात है. उन्होंने धीरे से बताया की वह दोनों अगर कार में गई तो कार का एक्सीडेंट अवश्यंभावी है क्योंकि श्री गर्ग बैक मिरर एडजस्ट कर के उन्ही दोनों को देख रहे हैं।

आने में तो भगवान् ने ही रक्षा की है। उनकी बात सुन कर हमें भी याद आया की आज गर्ग साहब की कार लहरा-लहरा कर चल रही थी, जबकि गर्ग साहब दिन में तो क्या रात में भी मदिरा पान नहीं करते। गर्ग साहब की नयनो से पीने की आदत का पता चला।यह उन्ही की आदत नहीं है इससे तो बड़े बड़े ऋषि मुनि भी नहीं बच सके। हमारे पास कभी भी कार नहीं रही, इसलिए हम इस तरह के नयन सुख से वंचित रहे। श्री वर्मा जी अभी छोटे हैं और उनकी नई गृहस्थी है, अभी उनके पास बहुत जीवन पड़ा है कार खरीदने के लिए और नयन सुख के लिए। अभी तो अपनी को ही देखने में मगन हैं।हमें गर्ग साहब की हरकत पर थोडा रंज तो हुआ, पर हर बात को पॉजिटिव तरीके से सोचने की वजह से इस बात में भी एक अच्छाई ढूंढ ली की हमारी ५२ वर्षीय जोहरा जबी श्रीमती अग्रवाल अभी भी हसीन और जवान है। और इस बात पर हमे रश्क है।हमने श्रीमती जी को डान्डस बंधाया. हमें याद था की हमारी श्रीमती जी पर हर वर्ष नव दुर्गा पर होने वाले रात्रि जागरण में देवी आ जाती थी।

सच में नहीं, परन्तु वह ऐसा ही प्रकट करती थी और उसी की आड़ में साल भर की भड़ास स्त्रियों पर निकाल लेती थी। हमने अपनी श्रीमती जी को यही याद दिलाया। अब तो श्रीमती पूर्ण आत्मविश्वास के साथ कार में सवार हो गयी। अब श्री गर्ग बैक मिरर में जब भी उनको ताकते, तो उन्हें देवी का रूप नज़र आता। बाल आगे मुह पर बिखरे हुए, मुह से भयानक डकारने और फुफकारने की आवाज़े, आँखों में भेंगापन, लुक हियर सी देएर, फुफकारने से बालो की लटो से कुछ बाल उड़ते हुए. रौद्र, वीभत्स और भयानक देवी रूप। गर्ग साहब ने डर के मारे बैक मिरर में देखना बंद कर दिया और उसको वापस पुरानी ओरिजिनल स्तिथि में री-एडजस्ट कर दिया।।थोड़े दिनों बाद हमें अति गोपिनिय सूत्रो से पता चला की उस पिकनिक के अगले दिन ही श्री गर्ग ने बैक मिरर ही हटवा दिया, क्योकि वह जब भी उसमे पीछे का ट्रैफिक देखते तो उन्हें वही डरावनी देवी नज़र आती। हमने राज को राज ही रखा. उसके बाद खूब पिकनिक मनाई ।

हास्य व्यंग्य दिलचस्प

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