Pawanesh Thakurathi

Abstract


4.5  

Pawanesh Thakurathi

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हास्टल में तीसरा दिन

हास्टल में तीसरा दिन

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"ए रूम नंबर सात ! बाहर निकल साले। अपने आप को समझता क्या है ?" कमरे के बाहर से किसी के गुर्राने की आवाज आई।

मैंने आराम से दरवाजा खोल दिया। इससे पहले कि मैं कुछ सवाल करता दो हट्टे-कट्टे लड़के मेरी बांह पकड़कर मुझे बगल के कमरे में ले गये। वहाँ पहले से तीन और लड़के मौजूद थे। उनके मुँह से शराब की बू आ रही थी। मेरे कमरे में पग रखते ही उन लड़कों ने अपशब्दों से मेरा स्वागत किया और बोले- "अब तू सिखायेगा हमें सही क्या है, गलत क्या है.. साला...।" उनमें से एक ने मेरा कालर पकड़ लिया और वह मुझसे हाथापाई करने लगा। अब तक मैं स्थिति को समझ चुका था। अतः मैंने धैर्यपूर्वक जवाब दिया- "माफ कीजिए भाई साहब। गलती हो गई। छोटे भाई से गलतियाँ हो जाती हैं। अतः नादान समझकर माफ कीजिए। आइंदा से ऐसा कभी नहीं होगा।"

उन पांचों लड़कों के बार-बार अपशब्द बोलने और क्रोधित होने पर भी मैं विनयशील बना रहा, जिसका परिणाम यह हुआ कि पांचों लड़के बाद में वापस चले गये और बिना किसी लड़ाई-झगड़े के मामला सुलझ गया।

यह बात उन दिनों की है जब मैं ब्वायज हास्टल में नया-नया था। हास्टल में प्रवेश लिए मुझे तीसरा ही दिन हुआ था कि यह घटना घटित हो पड़ी। गाँव के कालेज पढ़ने वाले निम्नवर्गीय छात्रों के लिए निवास स्थान के रूप में हास्टल ही सर्वोत्तम विकल्प है। शहर के महंगे कमरों में रहना उनके लिए संभव नहीं। जब मैं बी.ए. की शिक्षा ग्रहण करने हेतु कालेज आया तो, मैंने हास्टल को ही निवास हेतु उचित पाया। हास्टल में भी फर्स्ट फ्लोर का कमरा नंबर सात मुझे अपने लिए सर्वाधिक उपयुक्त लगा। हास्टल में एक रूम में दो लड़के साथ में रूक सकते थे। जिस रूम में मैं रूका उस रूम में दूसरा लड़का अभी कोई नहीं आया था। केवल मैं अकेला ही था। इससे पहले मैं हास्टल में कभी नहीं रहा। इसीलिए हास्टल मेरे लिए बिल्कुल नया था।

हास्टल में रहते हुए मुझे अभी तीसरा ही दिन हुआ था। यही कारण था कि मैं हास्टल के किसी भी छात्र से अच्छी तरह परिचित नहीं हो पाया था और न ही हास्टल की स्थितियों से अच्छी तरह वाकिफ हो पाया था। शाम के पांच बजे थे। हास्टल की दूसरी बिल्डिंग से शोरगुल की आवाजें आ रही थीं। मैं कमरे से बाहर आया तो एक लड़के ने मुझे बताया कि लड़के शराब पीकर ऊधम काट रहे हैं और जूनियर छात्रों से अनाप-शनाप कह रहे हैं। मुझे वह अच्छा नहीं लगा। मैं रूम नंबर तीन में गया और उधर खड़े एक सीधे दीखने वाले लड़के से बोला- "यह गलत बात है। शराब पीकर ऐसे ऊधम नहीं काटना चाहिए।" उसने कहा- "हां।"

कुछ पल बाद वह लड़का भी चला गया और मैं भी अपने कमरे में आ गया। वह सीधा दीखने वाला लड़का उन शराबी लड़कों का दोस्त है। यह बात मैं जान नहीं पाया था। मेरे कमरे में जाने के बाद उसने मेरे द्वारा कही बात उन शराबी लड़कों को बता दी, जिस कारण कुछ ही देर में वे मेरे कमरे में आ धमके। आगे क्या हुआ, वह आप जान चुके हैं।

रात को आठ बजे उन सीनियर पियक्कड़ लड़कों के दूत ने मेरे कमरे के बाहर आकर मुझे सूचना दी-"दस बजे भोले दा ने सबको टी.वी. रूम में बुलाया है। इंट्रो होना है सबका। आ जाना।" मैं समझ गया कि आज की रात सोने का सौभाग्य मिलना मुश्किल है। हास्टलों में रैगिंग हालांकि तब पहले से काफी कम होती थी, लेकिन फिर भी सीनियर छात्र जूनियर और नये छात्रों पर अपना रूतबा बनाये रखना चाहते थे। इसीलिए वो ये सब करते थे।

दस बजने से ठीक दस मिनट पहले उस दूत ने फिर से चिल्ला-चिल्लाकर मुनादी कर दी- "ऐ...आ जाओ रे...भोले दा ने सबको टी. वी. रूम में बुलाया है। इंट्रो होगा। कोई कमरे में नहीं रहेगा। जो रहेगा उसकी तोड़ दी जायेगी...।"

ठीक दस बजे तक सभी लड़के बैठक कक्ष, जिसे टी.वी. रूम के नाम से जाना जाता था, वहाँ पहुँच गये। बारह नये लड़के आये थे। उनका ही इंट्रो होना था। इन्हीं लड़कों में एक मैं भी था। सभी लड़कों को टी.वी. रूम के बाहर खड़ा होना था। सीनियर स्टूडेंट टी.वी. रूम के भीतर बैठे हुए थे। हमें एक-एक कर दरवाजा खटखटाकर 'मे आइ कम इन सर' कहते हुए भीतर आना था और इंट्रो देना था।

मैं लाइन में दूसरे नंबर पर खड़ा था। मुझसे पहले वाला लड़का इंट्रो देने भीतर गया लेकिन उसे बाहर भगा दिया गया। उसे दुबारा अपना इंट्रो देना था। बताई गई विधि का प्रयोग करते हुए मैं भीतर गया और सावधानीपूर्वक सीनियर स्टूडेंट के प्रश्नों का जवाब देता गया। अगर मुझे किसी प्रश्न का उत्तर नहीं आता, तो मैं 'सारी सर' कह देता था। शाम वाली घटना ने भी सीनियर्स के मन में मेरे प्रति अच्छी छवि बना दी थी। यही कारण है कि मेरा रात का इंट्रो सफल रहा। मुझे अलग से एक बैंच में बिठा दिया गया।

मेरे बाद एक बी.एस.सी वाला लड़का आया। उससे जब पिता का नाम पूछा गया तो बोला- "श्री धर्मेंद्र सिंह।"

"कौन धर्मेंद्र ? शोले फिलम का हीरो ?" एक सीनियर छात्र ने पूछा।

लड़का चुप रहा। इतने में दूसरे सीनियर ने चुटकी ली- "अरे इसका पप्पा तो बड़ा स्टार है रे। हीरोइन के साथ मजे लिया होगा।" सीनियर की इस बात पर कक्ष में ठहाके गूंज उठे। खैर पंद्रह मिनट तक सवालों से जूझने के बाद उस लड़के का इंट्रो पूरा हुआ और वह लड़का भी मेरे बगल में बैठ गया।

उसके बाद एक शरीर से लंबा-चौड़ा ह्रष्ट-पुष्ट लड़का कमरे में दाखिल हुआ। लड़के से भोले दा ने पूछा- "क्या नाम है तेरा ?"

"शंकर।" लड़के ने रौब से जवाब दिया।

"शंकर ! क्या शंकर ? शंकर चूतिया ? शंकर कमीना, शंकर हरामी। क्या ?" भोले दा ने कहा।

"गाली मत दो सर। अच्छा नहीं होगा।" लड़के ने फिर अकड़कर कहा।

"अबे भोसड़ी के...क्या करेगा ? साले, कुत्ते तेरी तो... बोलने की तमीज नहीं। भाग भोसड़ी के बाहर ! दुबारा देगा इंट्रो....।" भोले दा बिगड़ गया। वह लड़का बाहर चला गया।

"साला अकड़ू है। इसे तो ठीक करना पड़ेगा।" सभी सीनियर्स ने कहा।

इतने में एक लड़के ने आकर सूचना दी- "भोले दा। वो रूम नंबर तेरह वाला लौंडा इंट्रो देने नहीं आ रहा है।" "ए गणेश ! जा, तू बुला के ला। कैसे नी आयेगा साला।" भोले दा ने उसके साथ गणेश को भी भेज दिया। जल्द ही दोनों वापस आ गये- "भोले दा! वो नहीं आ रा है। कह रा है वार्डन से शिकायत कर दूंगा।"

भोले दा को ताव आ गया- "साले को अभी लाता हूँ।" उसके पीछे-पीछे सभी लड़के चल दिए। थोड़ी देर में एक लड़का नंगे पाँव दौड़ता हुआ हास्टल की सीढ़ियों से बाहर भागा। उसके पीछे-पीछे भोले दा भाग रहा था- "साले हास्टल में नजर आया तो तेरी टांग तोड़ दूंगा।" भोले दा ने सड़क तक उसका पीछा किया।

उसके बाद दुबारा इंट्रो हुआ और रात के ढाई बजे तक चला। चार-पांच दिनों बाद पता चला कि वह लड़का हास्टल छोड़कर ही चला गया।

अब जब भी मुझे छात्रावास के दिनों की याद आती है तो मैं पाता हूँ कि अपने विनम्र, सहज, सरल, साहसी और उदार स्वभाव के कारण ही मैं बिना किसी परेशानी के कई सालों तक छात्रावास में रहा। निश्चित रूप से व्यक्ति का स्वभाव ही वह अमूल्य निधि है, जो उसे कठिनतम एवं विपरीत परिस्थितियों में भी विजेता बनाकर सामने लाता है।


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