लैमिनेशन
लैमिनेशन
आज कितने दिनों के बाद मेरी एक पुरानी फ्रेंड घर आयी थी। हमारी बातें थी की ख़त्म ही नहींं हो रही थी। कभी वह कुछ कहती कभी मैं कुछ कहती। हमारी बातों का सिलसिला चलता ही जा रहा था। हम दोनों ही वर्किंग थी। इधर उधर की बातों के बीच पतियों की बातें होने लगी। मैं उसकी तरफ एक हाँ वाले रिप्लाय के एक्सपेक्टेशन के साथ कहने लगी, "कितना अच्छा है की हम फायनेंशियली इंडेपेंडेंट है,नहींं?
लेकिन यह क्या?
मुझे वहाँ उसकी डबडबायी आँखे नज़र आयी। मुझे जरा अचरज हुआ। क्योंकि मैं ही क्या कोई भी किसी वर्किंग वुमन को फायनेंशियली इंडेपेंडेंट ही समझेगा। लेकिन उसकी वह डबडबायी आँखे कुछ और कहानी कह रही थी।
वह मेरी पुरानी फ्रेंड थी। मेरे सुख दुख की साथी....
मैंने मद्धम स्वर में कहा, "तुम मुझसे अपने मन की बात कह सकती हो।" मेरी बात से उसकी रुलाई फूट पड़ी। शायद उसके पास न जाने कितनी अनकही बातें थी। "मैं बच्चों को देख आती हूँ..." कहते हुए उसे अकेला छोड़ दिया उसके मन का गुबार निकल जाने के कुछ देर के बाद मैं वहाँ गयी। एक फीकी हँसी हँसते हुए वह बोल पड़ी, "मेरे पति बिना किसी कारण मुझे मारते पीटते रहे है। और तुम मुझे फायनेंशियली इंडीपेंडेंसी की बात करती हो। क्या तुम जानती हो की मेरा एटीएम कार्ड भी मेरे पास नहीं होता था?"
मैं उसकी तरफ हैरत से देखने लगी। मेरी उस दोस्त ने कभी किसी को भनक तक लगने नहीं दी। मुझे भी नहींं...
मैं इस बात से इत्तेफाक रखती हूँ कि वर्किंग वुमन बहुत सारी बातों को मुस्कुराकर 'हैंडल' करती रहती है।
मैंने उससे सवाल किया,"वह क्या बात है कि तुम एक वर्किंग वुमन होने के बाद अपनी फायनेंशियली इंडीपेंडेंसी को छोड़ अपने पति की मार खा रही थी.... कोई जवाब है इसका तुम्हारे पास?"
हमारी बातें चल ही रही थी कि बच्चों की "मम्मी........." की एक जोर की आवाज़ आयी। मैं उठने लगी तो उसने मद्धम स्वर में कहा, "क्या तुम्हें अब भी तुम्हारे सवाल का जवाब नहीं मिला है ?
मेरे जेहन में बच्चों की "मम्मी......." की आवाज़ गूंजने लगी... शायद वह कहना चाह रही हो कि परिवार को बचाने की जद्दोजहद में ही वह टूटती रही..बिखरती रही...बिखरकर टूटती रही....
