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Kumar Vikash

Romance

5.0  

Kumar Vikash

Romance

कितने पास हो तुम

कितने पास हो तुम

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एक मौन सा अहसास हो तुम,

मेरी रूह की आवाज़ हो तुम !


मैं जो पढ़ न सका वो किताब हो तुम,

ज़ुबाँ के अनकहे से अल्फाज़ हो तुम !


तन्हाईयों का मेरी जवाब हो तुम,

नींद का अधूरा सा ख़्वाब हो तुम !


सोये हुये थे जो मेरे वो जज्बात हो तुम ,

कहा न जो तुम ही से, वो राज हो तुम !


मेरी धड़कन और मेरी सांस हो तुम,

दूर होकर भी मेरे कितने पास हो तुम !


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