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Kumar Vikash

Abstract

3.5  

Kumar Vikash

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ज़ुल्फ़ों की छाँव में

ज़ुल्फ़ों की छाँव में

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एक बार ही सही इन हवाओं का

रुख बदल जाये ,

उड़े जो तेरे बदन से ओढ़नी मेरा

कफ़न संवर जाये ।


ये जिन्दगी जो मेरी न गुजरी तेरी

ज़ुल्फ़ों की छाँव में ,

तेरे इत्र की खुशबू से मेरी कब्र का

मंज़र बदल जाये ।।


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