रोने के बाद हँसने का आलम
रोने के बाद हँसने का आलम
जिस दिन में रोते रोते
हँसा था यारो,
वो दिन ही कुछ और था,
जिक्र जिस बात का था,
फिक्र फिर उस राज का था,
जिसने हँसने पर
मजबूर किया था,
वो दिन ही कुछ और था,
आलम हँसी का था,
जो हंसी की राह से
रोने में बदल गया।
हाँ वो दिन ही
कुछ ओर था,
कारवां जो बढ़ चला,
फिर सन्नाटे में शोर था।
हम हँसते हँसते रो पड़े
वो दिन ही कुछ ओर था।
