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Kusum Joshi

Classics

4  

Kusum Joshi

Classics

विविधता में एकता

विविधता में एकता

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मेरे देश की मिट्टी ,

तेरे कण-कण में पावनता है,

हर कण में बसता प्रेम ,

यहां बसती मानवता है।


आदिकाल से तेरे दर पे,

कितने जन आए हैं,

विश्व में तू ही वो धरती,

जिसमें सब बस पाए हैं।


दुनिया के कई धर्मों का,

तू ही पालना है माता,

तेरे द्वार पे जो भी आता,

वो तेरा ही बन जाता।


वो आक्रांता हों कोई भले,

या पीड़ित प्राणी हो,

बोली भाषा अलग भले,

कोई अलग सी वाणी हो।


तूने माता सबको प्रेम से,

गले लगाया है,

इसीलिए ये देश सभी का,

घर बन पाया है।


यहां हिन्दू, मुस्लिम,

सिख, ईसाई,

सब प्रेम से रहते हैं,

सभी देश की रज को,

अपनी माता कहते हैं।


समभाव और भाईचारे का,

तूने पाठ सिखाया है,

तेरी रज को छूकर ही मुझको,

प्रेम समझ में आया है।


उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम,

कितने रंग इसमें हैं,

भारत तेरे कण-कण ने,

कितने भाव संजोए हैं।


खान पान में भी देखो,

यहां कितना अंतर है,

कहीं माता का भंडारा है,

कहीं गुरु दा लंगर है।


कहीं चर्च में कोरस की,

आवाज़ें आती हैं,

और कहीं मस्जिद में,

नमाज़ अदा की जाती है।


कहीं वेद का जाप कहीं,

गुरुवाणी होती हैं,

एक है ईश्वर,

सब धर्मों की प्रार्थना कहती है।


इस विविध रूप में भी,

एकता का पाठ पढ़ाया है,

तेरी रज ने बुद्ध महावीर का,

स्पर्श जो पाया है।


मैं धन्य हुई इस धरती पर जो,

जन्म मिला मुझको,

तेरी पावन रज को छूने का,

अवसर मिला मुझको।


जब-जब इस धरती पर,

जन्म पुनः मैं पाऊंगी,

मेरा वादा है माता,

तेरी ही गोद में आउंगी

मैं तेरी गोद में आउंगी।


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