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Prakash Chavhan

Horror


3  

Prakash Chavhan

Horror


वादळं

वादळं

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पाय विचारांचे उठले ना 

सुई शंकानं घेऊन फिरला 

भुई मनातून घोंघावतं 

आनंदाच्या दारीं मुकला ना 

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फिरला ना गावभर हिंदडत 

केस करून डोक्याचें चित्ररं 

उडवत क्षणाचे रूप काही

मंचवत मनात कल्लोळ कुणा 

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उखडत मन उखडत जातं 

नं राहून विरान उडतं असतं 

खटकतं हवा असें पर्यंत 

बिघडवत रूप नुकसानीच 

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वादळं असं वादळं तसं 

कधी जीवनात कधी सृष्टीत 

नेमक शांत होतं गरजेतं 

ताणलं जातं काहींकाही 

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पावतं ना समाधान ठेवून 

समजून पूर्ववत करता येतं 

पण जिणं थोडं वेळ खातं 

प्रेम विश्वास व्यहार बसायला 

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