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Prakash Chavhan

Abstract

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Prakash Chavhan

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मंदिर माणुसकी

मंदिर माणुसकी

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मंदिर माणुसकी 

जागवत आलं 

जागवत आहे 

हृदय मनामनात 

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इथलं इथंच राहील 

कुठं समावणारं 

सामावतं आत्मा 

मिळवून ते पण काही 

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भूमिका तया जेवढी 

हेतू काळाच खेळ

वलय फक्त जगण्यातं  

देवाच आधार बघतं  

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जग स्वास स्वार्थी

मंदिर परमार्थ शिकवत 

जाळं माय लोभाचं 

गौनं सार दाखवतं 

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कोण कशात जगत 

स्वप्न डोर धरून 

आलंय येतं जाता 

मोकळ भाव होतं 

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मन आश्रयी देव भाव 

कृपेसाठी भक्ती ठाव 

शांती पावते अंतरी 

जिणं समाधानंतं 

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