ज़रूरत वाली बात
ज़रूरत वाली बात
आज न जाने क्यों वह कुछ परेशान सी थी।बात कुछ नही थी लेकिन फिर भी कोई बात दिल को लग रही थी। कहते है कि जब दो लोग साथ होते है तो शेयरिंग और केयरिंग बढ़ती है।लेकिन उसके साथ तो ऐसा कुछ भी नही हो रहा था।बल्कि उसे ऐसा महसूस होने काग था कि अकेले रहना ज्यादा ठिक था।
इस बात को वह कैसे किसी को एक्सप्रेस कर सकती है ? क्या कर पायेगी ? क्या करना भी चाहिए ? उसकी इमेज का क्या होगा ? लोग क्या कहेंगे कि इतनी सी भी एडजस्टमेंट नही हो पा रही है इससे ? न जाने कितने सारे और भी सवाल उसके मन मे उमड़ते रहते थे। वह खामोशी से उन सवालों को देखती रहती.....कभी कभी वह उन सवालों से उनके जवाब भी पूछती। जवाब न देकर वे सवाल खामोशी से उसकी तरफ़ मुहँ मोड़ कर खड़े हो जाते थे।वह फिर परेशान होकर उन सारे सवालों से भागने की कोशिश करती। लेकिन वे सवाल फिर उसके साथ ही हो लेते थे।
दिन ऐसे ही गुजरते जा रहे थे। सेलेक्टिव होकर कोई कैसे बात कर सकता है भला ? लेकिन साथ रहने वाला गर ऐसा ही करे तो? क्या वह कोई बातचीत भी कही जाएगी ? यह कोई संभाषण तो नही हुआ ? यह तो जैसे अपनी जरूरतों को कहना हुआ न?
लेकिन उसे यह सब समझना होगा। अपनी हद को भी समझना होगा। और तो और बातचीत में भी सेलेक्टिव होना होगा।आज तक कि जिंदगी में जहाँ वह ढेर सी बातें करती आयी हो अब ज़रूरत के हिसाब से बात करना उसे कठिनतम काम लग रहा था...
ज़रुरत के हिसाब से बात करना.... सेलेक्टिवली बात करना...
ज़रूरत के हिसाब से बात करना शायद वह कभी सीख भी न पाएँगी।
हाँ, बीइंग राइटर लफ़्ज़ों के साथ वह जो चाहे बाजीगरी वह करती रहे....
