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Kunda Shamkuwar

Abstract Drama Others

4.5  

Kunda Shamkuwar

Abstract Drama Others

मेक ओवर

मेक ओवर

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20

कभी मुझे अपलक देखते हुए तुम कहा करते थे, "तुम्हारी इन गहरी और काली आँखों के बारें में क्या कहूँ? इन आय लाइनर लगी आँखों की गहरायी में डूब जाने का मन करता हैं…तुम आई ब्रो नहीं करती हो और ना ही लिपस्टिक लगाती हों… ना कभी मेक अप करती हो…सजने सँवरने के लिए तुम्हे कभी ब्यूटी पार्लर में जाते हुए नहीं देखा हैं…मेक अप के नाम पर फ़क़त आय लाइनर ही लगाती हो। तुम्हारी इसी सादगी वाले अंदाज़ पर मैं मर मिटा हूँ…देखना शादी के बाद हम ऐसे ही रहेंगे…डबल इनकम नो किड्स…नो टेंशन…घूमना फिरना… हमारे सुंदर से घर में बस हम दोनों…केवल हम दोनों ही रहेंगें…"
गाहे बगाहे ये कहते हुए तुम ठठा कर हँस देते थे और मैं बस मुस्कुरा दिया करती थी…

ऐसी बातों से भला कौन क़ायल नहीं होगा? मैं भी क़ायल हो गयी थी…ख़ुद को दुनिया की सबसे खुशनसीब इन्सान समझने लगी थी… हम दोनों बहुत घूमते फिरते थे। कभी किसी आर्ट एक्ज़ीबिशन तो कभी सिनेमा और कभी नाटक…

हम दोनों ही अपने अपने प्रोफ़ेशनल वर्ल्ड में बिजी हो गये। एकदूसरे को कॉम्प्लिमेंट करते करते हम अपने प्रोफेशनल वर्ल्ड में बहुत आगे भी निकल गए… हम दोनों के प्रमोशन्स होते गए…रिस्पांसिबिलिटीज़ बढ़ती गयी… और वक़्त कम से कम होता गया…
दिन पँख लगा कर उड़ने लगे…

लेकिन क्या वक़्त कभी एक सा रहता हैं भला?
वक़्त बदला…
तुम बदलें…
मैं बदली…
तुम्हारा अंदाज़ बदला…
और तुम्हारी बातें भी…

आजकल मुझे नज़र आने लगा हैं की तुम मुझसे निगाहें चुराने लगे हों। मैं हैरान हो कर तुम्हें देखने लगती की वह तुम ही थे जो मेरी आँखों की गहरायी में उतर जाने की बातें करते थकते नहीं थे…

"तुम आय ब्रो भी नहीं करती हो और बिना लिपस्टिक के एकदम फीकी लगती हो…और ये क्यों हर दिन सादे कपड़ों में फिरतीं रहती हों? तुम्हें जरा भी मेरा ख़याल नहीं हैं?"


तुम्हारी इन बातों को सुनकर मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं होता था… क्योंकि तुम तो सादगी पसंद थे और मेरी सादगी पर ही तो तुम मर मिटे थे…

इतने सालों के बाद अचानक मैं चेंज हो जाऊँ?
कोई एक व्यक्ति अचानक ऐसे कैसे बदलेगा? ये तो मेरे जैसे इंटेलेक्चुअल पर्सन के लिए 180 डिग्री चेंज नहीं होगा?
एक इंटेलेक्ट बट सिंपल पर्सनैलिटी वाली मैं अचानक से फ़ैशन परस्त हो जाऊँ?

क्यों?

कैसे?

धीरे धीरे मुझे ग्राउंड रियलिटी का एहसास होने लगा।
तुम घर आते…एक फीकी सी मुस्कान लिए…
चाय पीने के बाद तुम अपने मोबाइल फ़ोन में बिजी हो जाते…
बातें ख़त्म होती देख मैं भी कोई मैगज़ीन पकड़ लेती…

दरमियान मेड़ पूछने आती की बीबी जी, खाने में क्या बनाऊँ? कौन सी सब्ज़ी?
उसको ज़रूरी इंस्ट्रक्शन्स देने के बाद खाना खाकर फिर से तुम अपनी पर्सनल स्पेस में और मैं अपनी पर्सनल स्पेस में मशगूल हो जाते थे। काफ़ी दिनों से यहीं कुछ चल रहा था…जैसे हमारे रिलेशन की गर्माहट ही ख़त्म हो गयी हो…


मेरे लिए एक ख़तरे की घंटी…


किसे शेयर करूँ?
कौन समझेगा मुझे?


कोई कहेगा इसे तो सुख काटता हैं। इतना अच्छा कमाऊँ पति…अच्छी नौकरी करने वाला… बड़े बंगलें वाला… वेल सेटल्ड लाइफ…

इतने सालों की जमी जमाई गृहस्थी…
मेरी सोशल इमेज…
मुझे बदलना होगा…
मॉडर्न दिखना होगा…

संडे दोपहर पार्लर जाकर अपने लंबे घने बालों की शहादत दे दी।पार्लर वाली के इसरार करने पर फैशियल, मैनीक्योर पैडिक्योर भी कर बॉब हेयर के साथ घर आयी…
वार्ड रोब को भी तो स्टाइलिश करना था… फिर क्या?
महँगे और मॉडर्न स्टाइल वाले कुछ चटक रंग के कपड़े भी ख़रीद लिए…

शाम कोअपने दोस्तों से मिलकर तुम घर आये…तुम्हारी एप्रिशिएट करतीं निगाहों ने मेरे इस मेकओवर को नोटिस किया। "अरे, भई मैं अपने ही घर आया हूँ की किसी और के घर?"
"जनाब, आप अपने ही घर आए हो…बस आज पत्नी थोड़ी फैशनेबल हो गयी हैं…" हँसते हुए मैंने जवाब दिया…
"आज तुम बेहद ख़ूबसूरत लग रही हो…. चलो, आज मैं तुम्हारी पसंद वाली अदरक की चाय बनाकर लाता हूँ। हम साथ चाय पियेंगे। तुम भी क्या याद करोगी की किस रईस से पाला पड़ा हैं?"
हा…हा…हम दोनों ही हँस पड़े…बहुत दिनों के बाद हमारी दोनों की हँसी की आवाज़ सुनने को मिली।

चाय पीते हुए बातें हुईं… जनाब का मूड अच्छा था। दोपहर बिरयानी बनी थी तो रात को खाने का कोई टेंशन नहीं था। मेड़ की भी छुट्टी थी।

इसी खुशनुमा माहौल में तुमने जो बात कही उसे मैं अचकचा गयी…"तुम पूरे बदल गये हो। क्या हुआ हैं तुम्हें? बच्चें कहाँ से आ गये हैं अब? तुम ख़ुद ही तो कहते थे की बच्चें नहीं चाहिए? जब की मैंनें कितनी ही बार इसरार किया था… लेकिन तुम हर बार इनकार ही करते रहते । तुम ने तो बस एक बात पकड़ ली थी…मेरे बार बार इसरार करने पर तुम इनकार करते रहें…"

"हाँ, मैं कहता था पहले। लेकिन अब सभी दोस्तों के बच्चें और उनकी फ़ैमिली देखते हुए मुझे अब लगने लगा हैं की हमारे भी घर में बच्चें चाहिए… बिना बच्चों के एक खालीपन लगता हैं घर में…और हमारी ज़िंदगी में भी यह खालीपन अब पसरने लगा हैं …


क्या तुम्हें अपने घर में नहीं महसूस होता ख़ालीपन?
सब कुछ तो हैं अपने पास फिर भी ये ख़ालीपन क्यों?" 

"लेकिन ये तुम्हारी जिद थी …मेरी नहीं।"

हाँ, मैं मानता हूँ की डबल इनकम नो किड्स वाली  शादी का मेरा ही आईडिया था । लेकिन अब मैं बदल गया हूँ। मुझे हमारे बच्चें चाहिए। मुझे उनके बचपन की शरारतें और उनकी तोतली जबान वाली बातें सब एंजॉय करना हैं। 

वाक़ई आज का दिन मेक ओवर वाला दिन था। एक मेरा मेक ओवर और दूसरा तरुण के मन का मेक ओवर…

आज सुबह गुड मॉर्निंग के साथ तरुण चाय लेकर आ गये। "अरे, यह क्या? आपने क्यों जहमत की हैं?"
"आज से मैं ही तुम्हारे लिए बेड टी बनाया करूँगा। हमारे बच्चों को भी तो मुझे यह सब सिखाना हैं, नहीं?"
कहते हुए वह हँस पड़ा…बीती रात की ख़ुशनुमा यादों से मेरे होठों पर भी मुस्कान आ गयी…










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