मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

Abstract


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मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

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ज़िन्दगी प्यार का गीत है

ज़िन्दगी प्यार का गीत है

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अभिजीत को मुम्बई जाना था। ट्रेन दो घण्टे लेट थी। एक तो इतना लम्बा सफर और ऊपर से ट्रेन अपने स्टार्टिंग पॉइंट से ही लेट हो तो चिंता होना स्वाभाविक है। अब तो ज़िन्दगी सफर करते-करते थकी तो नहीं थी लेकिन ऊब ज़रूर गई था। हावड़ा स्टेशन पर तो वैसे भी बहुत भीड़ थी। कहाँ कोलकाता, कहाँ मुम्बई, लेकिन रोज़ी-रोटी जहाँ ले जाएगी जाना पड़ेगा। सोच रहा था लोग तो रोज़ी-रोटी, तलाशते-तलाशते विदेश चले गए। और वहीँ के हो के रह गए। प्लेटफार्म पर वैसे ही आवाजाही इतनी रहती है कि दिल बहलता रहता है। वक़्त का पता ही नहीं चलता। असल ज़िन्दगी का रूप भी यहीं देखने को मिलता है। किसी की आँखों में अपनों से मिलकर ख़ुशी के आँसू हैं तो कोई अपनों से बिछड़कर अपनी आँखों में ग़म का सैलाब समेटे हुए है। नहीं चाहता कि ये सैलाब बाहर निकल कर बिछड़ने वाले को भी जाते-जाते नम करे दे। कोई किसी के इन्तिज़ार में पलके बिछाए हुए घण्टों से बैठा है। तो कोई किसी और धुन में है।

तभी फ़ोन की घण्टी बजी .. देखा तो रोमा थी। 

हैलो, अभिजीत। 

हाँ, बोलो। अरे तुम्हारी ट्रेन तो अभी चली ही नहीं। मैं ने ट्रेस किया। 

मैं ने बताया था न अभी। एक घण्टा डिले बता रहा है। जब बैठूँगा तो मैसेज कर दूँगा।  

वह भी बोर हो रही होगी। चार दिन का बोलकर आया था। मम्मी ने दो दिन और रोक लिया। अब मना भी कैसे करता। पापा भी बोले अभिजीत घर आता है तो दो दिन में ही सूरत बदल जाती है। अभी तो पापा-मम्मी को रोमा का बताया नहीं है। बताऊंगा कभी मौका देख कर। बोलती तो है डिस्टेंस का कोई फर्क नहीं पड़ता। दिल मिले होना चाहिए। लेकिन एक बार ट्रेवल कर लिया न तो रो देगी। मुम्बई से पूना का तो आसान है कभी भी अपने घर चली जाती है। फिर मराठी वाला पेच भी फसेगा। मम्मी-पापा कैसे रिस्पॉन्ड करेंगे पता नहीं। ये ज़िन्दगी भी न ऐसे पेच फसाती है कि पूछो मत। ये एक पहेली भी तो है बस सुलझाते रहो। अपनी सोचों में ही कहीं गुम था की उसके कानों में एक मधुर सी आवाज पड़ी। 

ज़िन्दगी प्यार का गीत है। जिसे हर दिल को गाना पड़ेगा। 

ज़िन्दगी ग़म का सागर भी है, हंस के उस पार जाना पड़ेगा।  

ज़िन्दगी एक अहसास है ...

पलट कर देखा तो बेंच के पीछे एक बुढ्ढा सा आदमी, अपनी छोटी सी गिरस्ती के बीच बैठा, हाथ में ढपली लिए गा रहा था। गाने के बोल जितने सुन्दर थे उससे कहीं ज्यादा उसकी आवाज़ में कशिश थी। जैसे पूरी ज़िन्दगी को भिगोकर निचोड़ रहा हो। 

ज़िन्दगी एक बनबास है, काट कर सबको जाना पड़ेगा।

ज़िन्दगी प्यार का गीत है, जिसे हर दिल को गाना पड़ेगा। 

ये सारे बोल तो उसके कानों से उतरकर दिल की गहराई में पहुँच गए थे। अभिजीत का दिल कर रहा था इस गाने को डूब कर सुने। वह उसके पास पहुँच गया। अपना मोबाइल निकाला विडिओ रिकॉर्डर ऑन किया और बोला -"दादा एक बार और सुना दो ये गाना।" 

फिर क्या था अँधा क्या चाहे दो आँखे। दादा ने भी खूब झूम कर मस्ती से पूरा गाना सुनाया। अभिजीत ने फ़ौरन सौ का नोट निकाल कर दादा की और बढ़ाया। तो उनको ये पैसे कुछ ज्यादा लगे। क्योंकि दादा का गाना सुनकर प्लेटफार्म पर लोग पाँच-दस रूपये से अधिक नहीं देते थे। अब दादा से सवाल-जवाब करने लगा। 

क्या नाम है दादा ?

सुदीप रॉय। 

यहाँ कब से हो। बेटे पिछले दस साल से। अब हमारा यही ठिकाना है। और यही रोज़ी-रोटी। जो कुछ भी आप लोग दे देते हैं। बस उसी में पेट भर जाता है। 

बाल बच्चे कहाँ हैं ? 

नहीं पता। 

तो हैं ही नहीं कि तुम्हें पता नहीं है ?

अरे बेटे क्या करोगे तुम जानकर। अब तो जो ज़िन्दगी है, यही है। इसे काट कर जाना है। 

दादा ने फिर गाना शुरू कर दिया। 

ज़िन्दगी बेवफा है तो क्या। अपने रूठे हैं हमसे तो क्या।।।।

अरे दादा आप वह बात बताओ जो मैं पूछ रहा हूँ। आपका गाना तो मैं ने सुन लिया। 

बड़ी लम्बी कहानी है बेटे। अब तुम नहीं मानते हो तो सुनो। 

-"पत्नी के देहान्त के बाद दोनों बेटे मेरे कारण लड़ाई झगड़ा करते। एक कहता मैं नहीं रखूँगा तो दूसरा कहता मैं भी नहीं रखूँगा। उम्र के साथ मेरा कारोबार भी ठप्प हो गया। घर में हमेशा क्लेश का कारण में ही था। एक दिन मैं ने घर छोड़ दिया। जो रुपया पैसा जेब में था वह भी ख़त्म हो गया। बच्चों ने बहुत मनाया। लेकिन मेरा मन नहीं किया। इसके जाने के बाद अब उस घर से दिल वैसे भी उचट चुका था। बचपन में गुनगुनाने का शौक था। तो ट्रेन में फेरी लगाकर गाने लगा। लोग कुछ रुपया पैसा दे देते। मेरे गुज़र हो जाता। जब बच्चों को पता चला तो उनको ये सब रास नहीं आया और मुझ से नाता तोड़ लिया। अब यही प्लेटफार्म मेरा घर है और आप लोग मेरे बच्चे।

अब तक अभिजीत की ट्रेन भी प्लेटफार्म पर लग चुकी थी। सुदीप दादा की आत्मकथा सुनकर मन भारी था। फिर भी अपना बेग उठाया और ट्रेन में चढ़ गया। ट्रेन तो चल दी लेकिन उसका मन अभी वहीँ था। बर्थ पर लेट कर फिर आराम से ईयर फ़ोन लगा कर गाना ध्यान से सुना। अभिजीत मुम्बई में सॉफ्ट वेयर इंजीनियर था। फ़िल्मी लाइन से उसका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था। उसकी दुनिया ही अलग थी। न उसे इनसब में बहुत इंटरेस्ट था

जब मुंबई आया तो उसने रोमा को सारी बात बताई। रोमा उसकी सहकर्मी थी और अच्छी दोस्त भी। दोनों की चाहतें अभी परवान चढ़ रही थीं। रोमा गाने की बहुत शौक़ीन थी। उसने बाक़ायदा सिंगर क्लासेज ज्वाइन की थीं। रियाज़ सीखा था। उसको ये गाना बहुत ही सुर-ताल में लगा और अभिजीत को यू-ट्यूब पर अप-लोड करने की सलाह दी। इत्तिफ़ाक़ से ये विडिओ वायरल हो गया।

फिर क्या था लोग कमेंट करने लगे और अभिजीत उनके जवाब देने लगा। फिर एक दिन वालीवुड के मशहूर संगीतकार का कमेंट आया। वे अभिजीत से संपर्क कर उस तक पहुंचना चाहते थे। 

अभिजीत माध्यम बना और सुदीप रॉय जी मुम्बई नगरी आ चुके थे। उनकी आवाज़ की तुलना मशहूर गायकों से की जाने लगी। एक हीरो ने तो उनको घर तक खरीद कर दे दिया। 

जब बच्चों को सुदीप दादा की इस लाइम-लाइट वाली ज़िन्दगी की खबर लगी तो वे भी संपर्क में आए। उन्होंने सब को माफ़ कर दिया। 

अब उनके पास रेडियो स्टेशन के अलावा टेलीविज़न के भी ऑफर आये। लेकिन सबसे बड़ा बदलाव् तो उनकी ज़िन्दगी में तब आया जब उनको एक फिल्म के गानों का करार मिला।

अभिजीत और रोमा भी खुश थे उनकी इस छोटी कोशिश किसी की ज़िन्दगी के काम आई थी। 

उधर मम्मी कॉल पर थीं। सामने रोमा बैठी थी। अभिजीत बोल रहा था। मम्मी आप पहले वादा करो नाराज़ तो नहीं होगी। आज मैं आपको कुछ बताना चाहता हूँ। 

पहले बोल तो सही। मैं समझ गई तू क्या बोलना चाहता है। बहुत दिनों से देख रही हूँ, तेरे रंग-ढंग। बता कौन है वो लड़की जिसके बारे में तू बताना चाहता है। 

मम्मी रोमा नाम है उसका। मेरे साथ ऑफिस में ही है। अभिजीत ने डरते-डरते कहा। 

तुझे पसंद है क्या ?

हाँ मम्मी। प्लीज, न मत करना। बहुत अच्छी लड़की है। आप मिलोगे तो खुश हो जाओगे। अब की बार गिड़गिड़ाते हुए कहा। 

अरे जब तुझे पसंद है तो तेरी ख़ुशी में हम भी खुश हैं बेटे।

इतना सुनना था कि अभिजीत की ख़ुशी का तो ठिकाना ही नहीं रहा। 

एक बार फिर अभिजीत के मोबाइल से वही गाना बजने लगा। 

"ज़िन्दगी प्यार का गीत है जिसे हर दिल को गाना पड़ेगा।"  


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