Dr Jogender Singh(jogi)

Classics


4.5  

Dr Jogender Singh(jogi)

Classics


यादें

यादें

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एक साफ कागज़ हर कॉपी में छोड़ रखा है। कोई कहानी लिखूंगा कभी। शब्दों और व्याकरण को देखने वाली अध्यापिका नहीं होगी। ना कोई प्रूफ रीडर। गलती बार बार करूंगा , पर मन से लिखूंगा। कोई तो होगा जो मन से पढ़ेगा , शब्दों को नहीं , मुझे । लेखनी नहीं देखेगा, मेरे मन के उल्लास , पीड़ा , क्रोध , प्रेम को देखने वाला , क्यों नहीं होगा ज़रूर होगा। जिसे व्याकरण का ज्ञान भरपूर होगा , शब्दों का जादूगर होगा ,पर वो मुझे पढ़ेगा ।

बड़ी बहन को छोड़ /टाटानगर आना

टाटानगर (झारखंड ) तब बिहार में था। मेरी पढ़ाई की शुरुआत वहीं से हुई थी। पिता जी आर्मी में थे । एक साल के लिए मै , छोटी बहन और मां पिताजी के साथ रहे थे। बड़ी बहन को घर ही छोड़ दिया था । क्यों वो स्कूल जाती थी । कैसा लगा होगा उसको , जब मां /बाप दो ((भाई/बहन ))के साथ एक सात साल की बच्ची को छोड़ कर चले गए। गुस्से में होगी या शायद रो रही होगी? मुझे याद नहीं, मैने मुड़ कर नहीं देखा होगा उसको। पर मां ने कैसे छोड़ा होगा उसको? पता नहीं । क्या वही आंसू (अदृश्य ) वही अपनों से दूर जाने का डर उनकी शादी तक बना रहा था। उनकी मनस्थिति को सात साल की बच्ची को छोड़े जाने के परिपेक्ष्य में देखता हूं, तो मैं उनको समझ पाता हूं , थोड़ा सा। छोटा भाई टाटानगर में ही पैदा हुआ। क्या सोचा होगा उस छोटी सी बच्ची ने ,जब एक और भाई को मां की गोद में देखा होगा। जिस मां से चिपक जाने के लिए वो एक साल से इंतजार कर रही हो, उसकी गोद में जगह ही नहीं। पता नहीं , सब धुंधला सा। वही बच्ची मां बन आज सब की देख भाल कर रही है।

पिता जी की मार

रसोईघर था , औसत आकार का, बरामदा दोनों तरफ, सामने वाला चौड़ा था , किनारे से पांच सीढ़ियां थी। एक बड़ा सा कमरा था (हाल कहना ज़्यादा ठीक है) पीछे का बरामदा लंबा था ,पर चौड़ाई कम थी। पीछे की सीढ़ियां पतली पतली थी । यही था टाटानगर में हम लोगों का बसेरा। मुझे स्कूल में दाखिल करा दिया गया था। रोज़ आर्मी की ट्रक नुमा बस लेने और छोड़ने आती थी। स्कूल में मुझे कुछ भी समझ नहीं आता , जब टेस्ट के नंबर आते तो पिताजी आर्मी स्टाइल में दंड देने लगते । खाना बन्द, नाश्ता बंद। हवाई जहाज बन जाओ , हाथ नीचे किया तो झापड़। मुर्गा बन जाओ । बेचारी मां दुःखी होती । पिताजी के जाने के बाद समझाती पढ़ता क्यों नहीं ? मार खाता रहता है। मैं क्या बताता ,मन में ज़िद थी , मारा पढ़ने के लिए अब नहीं पढ़ना। यह तो अच्छा हुआ कि पिता जी के साथ एक ही साल रहे। नहीं तो मैं पढ़ता तो नहीं , यह पक्का था।

गाय का किताब से प्रेम

एक दिन सन्डे को पिताजी ड्यूटी पर गए थे। मैं सामने वाले बरामदे में बैठा , पढ़ने का अभिनय बहुत सफाई से कर रहा था। तभी मां ने आवाज़ लगाई , नाश्ता ले लो। मै किताब छोड़ कर नाश्ता लेने गया। जब तक वापिस आया , आधी किताब गौ माता के मुंह में थी आधी बाहर लटक रही थी। मै बाहर लटका हिस्सा पकड़ खींचने लगा , गौ माता अपना ज़ोर लगा रही थी और मैं अपना। मां पीछे से चिल्ला रही थी , छोड़ दे वो मार देगी तुम्हे।पर मैं आधी किताब खींच कर ही माना था। क्यों ? पढ़ाई से तो कोई मतलब नही था, शायद पिताजी की मार का डर था।

आर्मी ग्राउंड की फिल्में

कपड़े के पर्दे पर आर्मी ग्राउंड में फिल्म देखने , आर्मी जवानों के साथ चला जाता , जब तक पिता जी घर आएं ,गायब । जवानों के साथ मैस में खाना भी खा के लौटता , क्योंकि घर पर खाना बंद /मुर्गा बनो का आदेश तैयार रहता। उपकार को छोड़ , कौन सी फिल्म देखी याद नहीं । शायद फ़िल्म देखना भी पिताजी से विद्रोह का एक हिस्सा था । मारा क्यों?

सर्कस की टिकट 

एक बार शहर में सर्कस आयी , हम चारों लोग सर्कस देखने गए । टिकट खिड़की पर बहुत भीड़ थी। काउंटर से बीच बीच में लाठियां चलाई जा रही थी। पिता जी टिकट लेने भीड़ में चले गए। भीड़ की धक्का मुक्की से हम तीनो टिकट काउंटर से दूर धकेल दिए गए। गांव की अनपढ़ मां रोने लगी । देखा देखी छोटी बहन भी रोने लगी। मैं मां को दिलासा दे रहा था , पिता जी आ जाएंगे , रो मत। खैर पिता जी ने हम लोगों को ढूंढ लिया। सर्कस में क्या देखा , कुछ गोले, ऊंची ऊंची ज़ंजीरें ।शेर और लकड़ी की सीढ़ीनुमा सीटें जिस पर हम लोग बैठे थे । बस इतना ही याद है।

एक टांग पर खड़े सिर हिलाते बाबा

पिता जी जब मुझे पीट पीट कर थक गए । पर मैं कुछ भी नहीं पढ़ पाया। तभी हम लोगों के पड़ोसी एक पंजाबी परिवार ने सुझाया कि एक बाबा का आश्रम बारह किलोमीटर दूर है । हम लोग जा रहे हैं, आप भी आ जाओ इसकी पढ़ाई के लिए पूछ लेना? हार चुके पिता जी मान गए। सुनसान इलाके में एक छोटा सा मंदिरनुमा मकान था। ज़्यादा भीड़ नहीं थी। लोहे की हरे रंग की जाली के पार , एक बाबा खड़े थे , एक टांग पर , लगातार सिर हिला रहे थे। पहले हमारे पड़ोसियों ने संतान के लिए पूछा । फिर मेरी पढ़ाई के बारे में पूछा गया। बाबा हाथ उठाते , सामने देखते और सिर हिला कर चेलों को कुछ इशारा करते। बगल के कमरे में एक चेला विस्तार से बता रहा था। मेरे बारे में उसने कहा बाबा बोले है इसको पढ़ने के लिए कभी न कहना, यह खुद बहुत पढ़ेगा। और पीला कपड़ा न पहनाना। मेरी मां कहती हैं पीले कपड़े के लिए मना नहीं किया था । पर मै पिछले छह सालों से ही पीला कपड़ा पहन रहा हूं। फिर किसी ने कभी भी मुझे पढ़ने के लिए नहीं कहा और मैं पढ़ता चला गया।

बाय बाय स्कूल

मेरे पास होने की संभावना नगण्य थीं। एक महीना बचा था । और एग्जाम दो महीने बाद थे। सो मुझे स्कूल से निकाल लिया गया। पिताजी ने घर जाकर मेरा दाखिला दूसरी क्लास में करवा दिया था। पता नहीं कैसे । और गांव में में दूसरी क्लास में सेकंड आया था। उसके बाद का सफ़र फिर कभी।


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