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V. Aaradhyaa

Abstract Action Crime

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V. Aaradhyaa

Abstract Action Crime

वो तुम्हें प्यार करता है ना?

वो तुम्हें प्यार करता है ना?

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जब पग फेरे के रस्म के लिए मायके गई थी और माँ के एकांत में किए हुए प्रश्न कि,

"राघव तुम्हें प्यार तो करता है ना?"


अपनी माँ के इस सवाल के जवाब में जब नलिनी शरमाकर चुप रह गई थी। तब माँ ने इसे स्त्री सुलभ लज़्ज़ा ही माना था। वैसे भी नलिनी की कोई भाभी या कोई बड़ी छोटी बहन तो थी नहीं जिनसे वह अपने मन की बात कहती। ले देकर एक बारहवीं में पढ़ने वाला भाई था आरव जो दीदी के ससुराल जाने पर उसका खाली कमरा अपने नाम कराकर बहुत खुश था।


बहरहाल, नलिनी जब पग फेरे के बाद वापस आई तो फिर दो तीन दिन राघव के रंग ढंग देखकर उसने माँ के सवाल का जवाब ढूंढने के चक्कर में आज से डाइरेक्ट पूछ लिया जिसका जवाब एकदम अप्रत्याशित था कि राघव किसी और से पुरुष से प्यार करता था।


"यह शादी क्या आपकी मर्ज़ी के बगैर हुई है? या आपको मैं पसंद नहीं?"

नलिनी ने राघव से पूछा तो राघव कुछ नहीं बोला और सोने का उपक्रम करते हुए जाकर सेठी पर लेट गया।


उसके इस बेलौस व्यवहार से आज़ीज़ आकर नलिनी ने राघव से पूछ ही लिया,


"आप ही बताइये कि क्या कमी है मुझमें? आप मुझसे क्यों खींचे खींचे से रहते हैं? अगर मैं आपको पसंद नहीं थी तो आपने मुझसे शादी के लिए हामी क्यूँ भरी थी?"


"ऐसी कोई बात नहीं है?"

राघव ने अटकते हुए कहा।


तो नलिनी तनिक रोष में बोली,

" फिर क्या बात है राघव? आपको कोई और पसंद हो तो बोलिए। मैं आपका घर छोड़कर आज ही चली जाती हूँ!"


ना जाने कैसे एक रौ में बोलती चली गई नलिनी ।


नलिनी की बात सुनकर बदले में जो कुछ भी राघव ने बताया उसे सुनकर नलिनी की साँस जैसे गले में ही अटक गई।


"आपमें कोई कमी नहीं है नलिनी ! मैं ही आपके काबिल नहीं हूँ। मैं किसी अन्य पुरुष से प्यार करता हूँ!"


पलांश में पूरी दुनिया घूम गई थी नलिनी की। जिस रूप पर इतना गुमान था उसे कि उसे तो कोई लड़का ना कर ही नहीं सकता और उसे पाकर कोई भी अपनी किस्मत को दिन में सौ दफ़े सराहेगा। वह धारणा एकदम धूमिल हो गई।


राघव पर उसके रूप का जादू ज़रा सा भी असर नहीं कर पाया था। तभी तो आज शादी के सातवें दिन तक भी तन मन से पति के प्रेम से अछूती रही थी नलिनी। यहाँ तक कि

और अब.....?


नलिनी के लिए यह पता लगाना बेहद ज़रूरी था कि उसने नलिनी से शादी क्यों की?


नलिनी गुप्ता वर्मा सिर्फ एक नाम ही नहीं बल्कि कानपूर में एक जाना पहचाना नाम थी। एक तो अपनी खूबसूरती की वजह से दूसरा अपने नामी गिरामी खानदान की वज़ह से। कभी दादाजी ने छोटे पैमाने पर शुरू किया था चिकनकारी कुर्ते के साथ हस्त कलाकारी वाले बैग बनाने का व्यापार अब आकृति के पिताजी और चाचाजी की मेहनत और लगन से वृहत रूप ले चुका था।


अपनी लाडली बिटिया पर पापा सुरेश जी का लाड़ कभी खत्म ही नहीं होता। घर की बड़ी संतान और तीन भाइयों की लाडली बहन थी नलिनी । अपने सगे भाई आरव और चचेरे भाई अरुण, अखिल में दिल की कोमल और संवेदनशील नलिनी कोई भेदभाव ना करती तो बदले में तीनों भाइयों का भरपूर प्रेम और सम्मान भी मिलता था उसे । माँ और चाची भी बस उसकी मुस्कुराहट की बाट जोहती रहती। चाचा मनीष जी का प्यार भी कहाँ कम था।


नलिनी की शादी में शानदार गाड़ी उन्हीं की तरफ से तो तोहफ़े में दी गई थी। घर भर की लाडली नलिनी को।


अमूमन तौर पर लड़की वालों की तरफ से जाता है रिश्ता। पर नलिनी के लिए राघव का रिश्ता जब सामने से चलकर आया तो...


एकबारगी उसके पापा और चाचा सोच में पड़ गए कि अपने यहाँ ज़ब लड़कियों की शादी में दान दहेज़ का इतना बड़ा टंटा है और लड़केवाले खुद से लड़की के घर रिश्ता भिजवाने में अपनी हेठी समझते हैं तो ऐसे में राघव के पिता भी एक व्यापारी थे उन्होंने किसी बिचौलिए के हाथ जब रिश्ता भिजवाया तो सीधे सरल नलिनी के पापा ने इनकार करने के बजाए उन लोगों से मिलना तय किया।


नियत समय पर दोनों परिवार एक बड़े से रेस्टोरेंट में मिले। जब राघव सामने आया तो नलिनी  चौंक गई।


वह बहुत ही हैंडसम लग रहा था।

और बेहद संजीदा भी रहता था।


नलिनी को तो पहली नज़र में भा गया था राघव। दो एक बार नलिनी ने उसे प्रशंसा भरी नज़रों से देखा था। पर राघव शांत था।


वैसे तो राघव का परिवार व्यापार में उनसे उन्नीस से भी कुछ कम ही था। पर सबकी बातों से सभ्यता और संस्कार झलक रहे थे। इसके अलावा उन्होंने अन्य रिश्तों की तरह गहनों और दहेज़ की कोई लंबी फेहरिस्त नहीं थमाई थी जिससे नलिनी का परिवार बहुत प्रभावित हुआ था।


बहरहाल...

राघव और नलिनी को जब अकेले में बात करने के लिए छोड़ा गया तो नलिनी तो शर्म से अपनी तरफ से कुछ बोल नहीं पाई। राघव को देखकर उसे थोड़ी झिझक सी महसूस हुई।


उन दोनों को एकांत मिलते ही राघव ने ही बात शुरू की थी।


"कैसी हैं आप?"

जब राघव ने बेहद बेलौस आवाज़ में पुछा तोनलिनी को थोड़ा अटपटा तो लगा।

पर नलिनी ने सोचा...


पहली बार बात कर रहा है शायद इसलिए औपचारिक हो रहा होगा। उस दिन महज़ औपचारिक बातें हुईं दोनों के बीच। लड़केवालों को सगाई और विवाह की कुछ ज़्यादा ही जल्दी थी।


इसी बात पर चाची ने नलिनी को छेड़ते हुए चुपके से राघव का नंबर उसके मोबाइल में सेव करवा दिया जो उन्होंने चलते हुए उससे माँग लिया था। उन्हें पता था उनकी शर्मीली नलिनी तो अपनी तरफ से नंबर माँगने से रही।


एक दो बार ही औपचारिक बात हुई थी राघव और नलिनी की। फिर दोनों की सहमति से महीने दिन बाद ही दोनों की धूमधाम से शादी हो गई और नलिनी राघव की दुल्हन बनकर उसके घर आ गई।


शादी के शुरू के दो दिन तो बड़ी ही ग़हमागहमी में बीते। राघव पहली रात ही काफ़ी देर से कमरे में आया और कमरे में एक तरफ रखे सोफे पर ही सो गया तो नलिनी ने सोचा थकावट होगी। अगले दिन रिसेप्शन और फिर पगफेरे के लिए मायके जाना था। सो अगले दिन भी दोनों में ज़्यादा बातचीत ना हो पाई।


मायके से आकर शादी के पूरे चार दिन बाद आज नलिनी को पूरा अंदेशा था कि आज रात्रि के नीरव एकांत में राघव ज़रूर उससे अपने प्रेम का इज़हार करेगा। इसलिए उसने सोने से पूर्व अपना सुरुचिपूर्ण श्रृंगार किया और काफ़ी देर तक राघव का इंतज़ार करती रही। पता नहीं रात के किस पहर राघव आया और चुपके से सोफे पर पड़ रहा इसका पता नींद में डूबी हुई नलिनी को नहीं चला। अगले दिन उसके मन की बात जानने को नलिनी ने खुद आगे बढ़कर राघव से कहा,


"आप बहुत थक गए होंगे। आप उधर सेठी पर सो जाइए और मैं इधर सो जाती हूँ!"


नलिनी का इशारा बिस्तर की तरफ था। उसने मन ही मन सोचा था कि राघव उसे अपनी बांहों में भर लेगा और प्यार से उसके रेशमी बालों में हाथ फिराते हुए कहेगा कि...


"यूँ तुम मुझे अपने आप से अलग अलग रहने के लिए क्यों कह रही हो? "


फिर दोनों प्यार में डूब जायेंगे। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।


अगले दिन भी जब राघव ने नलिनी की बात मान ली और जाकर सोफे पर सो रहा तो नलिनी को फिर से बहुत ताज़्जुब हुआ कि आखिर राघव उससे दूर दूर क्यों रह रहा है।


आज नलिनी ने ठान लिया थी कि राघव से उसकी बेरुखी का कारण जानकर रहेगी।

जब नलिनी ने दूसरी बार राघव को झकझोरकर पुछा कि...

उसने आखिर नलिनी से शादी क्यों की...?

तो राघव ने बिना लाग लपेट के उससे सच्ची बात बता दी।


वैसे तो नलिनी का खानदान पहले ठीक ठाक था। पर अब पिछले दस सालों से कर्ज़े के बोझ से दबा हुआ था। ऐसे में काम पर लगने के बाद जब घर में राघव की शादी की बात चल रही थी तब उसने अपने समलैंगिक होने की बात घर में सबको बताया था पर उसके माता पिता ने उसे डांटकर अपनी असलियत और किसी पर उजागर करने के लिए मना किया और कहा कि घर को कर्ज़े से बचाने के लिए राघव को यह शादी करनी ही पड़ेगी।


इतने पर भी जब राघव नहीं माना तो उसके पिता ने उसे बैठाकर अच्छी तरह समझाया कि,


"देखो बेटा! अभी हम पर कितना कर्ज़ा चढ़ा हुआ है और अगर जल्दी ना उतारा गया तो हम सबको बेघर भी होना पड़ सकता है!"


ऊपर से मजबूरी ऐसी कि राघव से छोटी दोनों बहनें विवाह योग्य हो गईं थी। उसकी बड़ी बहन के पति ने भी अभी उसे वापस ले जाने से यह कहकर इनकार कर दिया कि जब तक वह शादी के समय दहेज़ के निमित्त गाड़ी नहीं ले आती तब तक उसे ससुराल में नहीं रखा जायेगा। वो लोग ऐसा इसलिए कर रहे थे कि राघव की बड़ी बहन आशा की शादी में लड़कीवालों की तरफ से गाड़ी देने की बात तय हुई थी पर दी नहीं गई थी। अब आशा के ससुराल वाले उसे ले जाने को तैयार नहीं थे।


ऐसे में जब धन धान्य संपन्न नलिनी के परिवार से रिश्ता आया तो राघव के पिता ने एकदम से स्वीकार लिया।


जब ...


बिचौलिए ने बताया था कि नलिनी का परिवार सुविधा संपन्न है और बिना माँगे अपनी लाडली को खूब दान दहेज़ देंगे।


और इधर राघव के पिता अपना कर्ज़ा उतारने के साथ अपनी दोनों बेटियों की शादी भी आसानी से कर पाएंगे। इसलिए राघव को अपनी असलियत छुपाकर नलिनी के साथ शादी के लिए हाँ कहनी पड़ी। पर अब नलिनी की रोज़ रोज़ की ज़िद और मासूमियत देखकर वह उससे झूठ नहीं बोल पाया और सब कुछ सच सच बता दिया।


सबकुछ सुनकर नलिनी एकदम हतप्रभ थी। जैसे उसे किसी ने पत्थर का बना दिया हो।


नलिनी को इस हाल में देखकर राघव दौड़कर उसके लिए पानी ले आया और उससे बार बार माफ़ी माँग रहा था। पर नलिनी जैसे सुनकर भी नहीं सुन पा रही रही थी। उसके प्यार की दुनिया तो बसने से पहले ही उजड़ गई थी।


नलिनी के लिए वह रात अमावस से भी काली और बहुत लंबी प्रतीत हुई।


आज नलिनी के सामने बैठा हुआ हैंडसम हंक प्रतियोगिता का विनर राघव आज उसकी आँखों में एक कापुरुष लग रहा था जिसने दहेज़ के लालच में उसकी ज़िन्दगी बरबाद कर दी थी।


अगले दिन सुबह सुबह नलिनी ने अपने पापा को फोन लगाया और कहा,

  

उसकी ठंढी और उदास आवाज़ सुनकर सुरेश जी को अजीब सा लगा। वह छोटे भाई हरीश को लेकर फौरन चल पड़े। घर की औरतों को भी कुछ नहीं बताया गया उनसे। अपनी लाडली बिटिया की उदास आवाज़ ने उन्हें अंदर तक हिलाकर रख दिया था।


दोनों भाइयों के इस तरह बिटिया के ससुराल रवाना होने से घर की औरतें किसी अनहोनी की आशंका से काँप उठी कि कहीं नलिनी को कुछ ना हुआ हो। माँ ने अपनी बिटिया को फोन लगाया तो उधर सामान बाँधने में व्यस्त नलिनी ने शायद फोन को साइलेंट कर रखा था। उसके फोन नहीं उठाने से घर में सबकी चिंता बढ़ गई थी।


पिता के आने तक नलिनी बहुत हद तक खुद को संभाल चुकी थी और अपना सारा सामान भी अच्छे से बाँध चुकी थी।


इतने में राघव ने उसके लिए चाय का कप लाकर रखते हुए मिन्नत कर गया था कि वह जाना ही चाहती है तो चुपके से चली जाये, ज़्यादा हंगामा ना मचाए।


पर...... अब नलिनी उसकी बात मानती भी क्यूँ?


जब तक नलिनी के पापा और चाचाजी आए तब तक नलिनी अपना पूरा सामान बाँधकर तैयार हो चुकी थी। जब उसके पापा ने जब उससे यूँ अचानक उन्हें बुलाने का कारण पुछा तो नलिनी ने पूरे परिवार को हॉल में बुलाया और सबके सामने निडर होकर संयत स्वर में पूरी बात बताई कि राघव ने दहेज़ के लालच में उससे शादी की थी। किसी को ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि कल की आई नई बहू यूँ उनकी सच्चाई सबके सामने लाकर रख देगी। और पूरे समय राघव बिल्कुल चुप रहा था सर झुकाए।


आगे की कहानी का अंदाजा तो पाठक लगा ही चुके होंगे। आगे नलिनी के परिवार वाले ने अपनी बेटी का पूरा साथ दिया और तलाक के बाद दहेज़ की रकम भी वसूल लिया।


शादी में दिए हुए दहेज़, पैसे और गहनों का सामान तो वापस मिल गया पर नलिनी को अपने दिल और भावनाओं के छले जाने का मलाल अरसे तक रहा था।


अगले दो साल बाद जब नलिनी की शादी के लिए प्रवीण का रिश्ता आया तो उसकी और उसके परिवार की छानबीन करने में आकृति के पापा और चाचा दोनों ही बहुत सतर्क तो थे ही। और नलिनी ने भी इस बात का बहुत ध्यान रखा कि उसके होनेवाले पति को उससे बात करने में, उसकी पसंद नापसंद जानने में रुचि हो ना कि उसके द्वारा आनेवाले दहेज़ से मतलब हो।


वैसे भी इस बार सुरेशजी ने जो भी उपहार नगद और गहने दिए वह सब नलिनी के अकाउंट में ही जमा कराए गए। प्रवीण बहुत सुलझा हुआ जीवनसाथी साबित हुआ।


यहाँ नलिनी के माता पिता समझदार थे और उन्होंने अपनी बेटी को इस बार तो

मजबूरी में रिश्ता स्वीकार करने के बजाए स्वाभिमान से जीने में सहायता की।

तभी तो दहेज़ के लोभी राघव और उसके परिवार का पर्दाफाश हो सका।


(समाप्त )


प्रिय दोस्तों!

कैसी लगी आपको यह कहानी?

कृपया अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर दें।

धन्यवाद



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