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V. Aaradhyaa

Classics Inspirational

4.5  

V. Aaradhyaa

Classics Inspirational

माँ तो माँ होती है

माँ तो माँ होती है

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एक माँ अपने बच्चों के लिए ही तो जीती है. हमेशा उनके हित में ही सोचती रहती है.

आज भी....

रागिनी ने अपना रोज का काम पूरा कर लिया था। पति गौरव और बेटा यश दोनों कॉलेज चले गए थे। उसकी आँखों में अकेलापन उतर आया था। 

पता नहीं क्यों, जैसे ही सारा काम खत्म कर खाली हो जाती, उसे अकेलापन महसूस होने लगता। पहले पड़ोस में आदोस-प्रदोस के पास जाती थी, लेकिन अब वहां भी मन नहीं लगता था।

कई दिनों से सोच रही थी कि कोई नौकरी कर लूँ, लेकिन नौकरी छोड़े हुए उन्नीस साल हो चुके थे। अब कौन पूछेगा। अच्छा होता अगर नौकरी नहीं छोड़ी होती। बेटा माँ और नौकरानी के सहारे एक पल होता। लेकिन अभिमान की ज़िद ने नौकरी छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। और अब ये अकेलापन। ओह।

जैसे हर रोज़ की तरह वह बस सोच में डूबी हुई थी कि अचानक दरवाजे की घंटी बजी। दरवाजा खोलने पर आठ-दस साल की एक लड़की कुचले हुए कपड़े पहने खड़ी थी।

"कोई काम हो तो दे दो आंटी, कुछ पैसे या रोटी मिल जाएगी," उसने सुबकते हुए कहा।

"लेकिन काम, तुम्हारी तो अभी पढ़ाई करने की उम्र है।"

"आंटी, मेरे पापा का पिछले साल देहांत हो गया। माँ की तबियत उससे भी खराब है, वह कम काम कर पाती है। मैं और मेरा छोटा भाई कुछ कर सकते हैं और दिन की रोटी मुश्किल से जुटा पाते हैं। पढ़ाई कैसे करें। जब फीस नहीं दे पाए तो स्कूल वालों ने निकाल दिया," लड़की ने हिलते हुए बताया।

"अच्छा, रुको यहीं।" रागिनी अंदर से कुछ रोटियाँ और सब्जियाँ कागज़ में लपेट कर ले आई।

"कल अपने भाई और माँ को ले आना। मैं तुम दोनों को काम दिलाऊंगी और तुम्हारी माँ को डॉक्टर को दिखाऊंगी।"

"धन्यवाद आंटी।" लड़की की आँखों में कृतज्ञता भर आई।

रागिनी ने जल्दी से बाहर के कमरे को खोलकर सफाई कर दी। फिर तैयार होकर बाजार चली गई। उसे बच्चों के लिए कपड़े, किताबें, खिलौने और कुछ खाने का सामान लाना था। अब उसकी चमकती आँखों में बच्चों को पढ़ाने के सपने तैर रहे थे।


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