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Pawan Gupta

Horror Thriller


4.7  

Pawan Gupta

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वो जंगल की रात और मेरी साइकिल

वो जंगल की रात और मेरी साइकिल

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 आज हम आपको मिलाते है ,हमारे मित्र वीर बहादुर जी से !

जैसा नाम वैसी ही दमदार आवाज वैसी ही कद काठी और निडर व्यक्तित्व !

वीर बहादुर जी करीब करीब 6 फुट के होंगे ,शरीर एकदम गठीला ,लम्बी लम्बी मूंछे ,आँखे बड़ी बड़ी हंसी रावण से कम न थी, जैसा शरीर वैसी ही मोटी बुद्धि !

उनको तो डर लेश मात्र का नहीं लगता था ,कभी भी किसी से भी भीड़ जाना तो उनके प्रकृति में था ,बस उन्होंने अपनी जवानी के दिन जीने के बाद अब तीसरी इनिंग्स मतलब बुढ़ापे को जीने की तैयारी चल पड़ी थी , उनकी उम्र लगभग 55 वर्ष होगी , चेहरे पर झुरिया आने लगी थी !

वीर बहादुर जी बिहार के मुंगेर जिले के एक सरकारी दफ्तर में काम करते थे ,उनके घर से सरकारी दफ्तर लगभग १० किलोमीटर की दुरी पर होगा ,वो साइकिल से एक घंटे में घर से दफ्तर और दफ्तर से घर आसानी से चले जाते थे ,जैसी उनकी कद काठी थी ,उससे आप अंदाजा ही लगा सकते है ,कि ये उनके लिए आम बात थी !

उनका खान पान इस उम्र में भी बहुत अच्छा था ,उनकी एक और आदत थी कि सप्ताह के ६ दिन दफ्तर से आते वक़्त शाम को दो बोतल ताड़ी जरूर पीते थे , ये उनकी दिनचर्या में शुमार था !

सुबह उठना १०० दंड बैठक लगाना ,३० मिनट की दौड़ , फिर डिप्स मारना ,बहुत सारा कसरत करना ये सब आम था !सुबह 5बजे से ये सब शुरु हो जाता था ,और ये सब ख़त्म कर आधा लीटर दूध अकेले गटक जाते थे ,फिर खाना खाकर दफ्तर निकल जाते थे !

ये बात सन 1979की है ,चलिए सुनते है वीर बहादुर जी की कहानी उन्ही की जुबानी .....

आज दोपहर ३ बजे हम लोगो की तनख्वाह बटी और जिस दिन तनख्वाह मिलती है ,उस दिन तो मुझे बहुत ख़ुशी मिलती है क्युकी एक दिन मैं मन भरकर ताड़ी पीता हू ,सो अब तो मुझे जल्दी लगी है कि मेरी छुट्टी हो जाये !

तभी बड़े साहब मेरे डेस्क पर आकर - अरे ..वीर बहादुर ये तीन फाइल आज कम्पलीट कर दो ,ये कल जानी है !

 वीर बहादुर - स ...स...साहब पर अब तो ३ बज गए है !

 बड़े साहब - तो क्या हुआ ! वीर बहादुर ३ ही तो बजे है ,अभी परेशां क्यू हो रहे हो ,हमें भी पता है ,आज तनख्वाह का दिन था आज तुम मज़े करोगे ,पर उससे पहले थोड़ा काम कर लो ,फिर शाम को मज़े तो करना ही है !

वीर बहादुर - अच्छा साहब कर देता हू,कहकर काम में लग गए ! क्या करते ३ घंटे थे मना कैसे करते ,हां पर काम जल्दी जल्दी करने लगे ,कि काम के चक्कर में वो आज लेट ना हो जाये !

आखिरकार काम ५:४५ तक ख़त्म भी हो गया !

वीर बहादुर-(बड़े साहब को तीनो फाइल देते हुए )साहब देख लो सारा काम हो गया है अगर आपका काम ख़तम हो गया है तो जाऊँ !

बड़े बाबू -(हां.. हां.. हां हस्ते हुए) गुस्सा क्यों होते हो वीर बहादुर जाओ और खुसी मनाओ पर ध्यान रखना ज्यादा मत पी लेना की घर ही न पहुँचो !(हां.. हां ...हां ...हस्ते हुए बोले) 

वीर बहादुर -अरे साहब ताड़ी में इतना नशा कहा की वीर बहादुर को हिला सके फ़िक्र ना करो साहब में आराम से घर पहुंच जाऊंगा !

शुभ रात्रि साहब

बड़े बाबू- शुभ रात्रि...शुभ रात्रि

मैंने अपनी साइकिल उठाई और पहुंच गया ताड़ी के दुकान पर!

आज तो मुझको रोकने वाला कोई नहीं था , रोज 2 बोतल पीता था आज तो पांच हो गयी और मुझे पता भी नहीं चला !

मुझे अब होश ही नहीं था कि मैंने कितनी बोतले गटक ली है ! और ना ही होश था कि मैं यहाँ ताड़ी की दुकान पर कब से बैठा हूँ !

एक आदमी ने मुझसे कहा वीर बहादुर भैया घर कब जोओगे नौ बज गए है , आप होश में भी नहीं लग रहे हो !

मुझे बहुत तेज़ गुस्सा आया मैंने डाटते हुए कहा मेरी चिंता छोड़ मैं घर चला जाऊंगा और बोलते हुए अपनी साइकिल उठाई और लड़खड़ाते साइकिल चलाते निकल पड़ा घर की ओर !

आज देर भी हो गयी थी और मैं अपना रास्ता भी भटक गया था ,मैं चलते चलते किसी गलत रस्ते पर चला गया !

सड़क एक दम सुनसान पड़ी थी और आगे जंगल शुरु हो गया ,उस जंगल में एक पगडण्डी जा रही थी पर मुझे होश कहा था कि मैं कहा जा रहा हू!

मैं साइकिल को पेंडल मरता हुआ जंगल में घुस गया एक दम गहरा अँधेरा अगर कोई और होता तो उसकी ऐसी तैसी हो जाती पर एक तो मैं नशे में था दूसरा की मुझे किसी से डर नही लगताथा !

जंगल में घुसते ही झींगुरो की आवाज गूंजने लगी जंगल में सनाटे के साथ साथ एक ठण्ड का एहसास होने लगा !

दो घंटे हो चुके थे पर मैं रास्ते में ही था और नशा भी कम हो रहा था अब धीरे धीरे मुझे एहसास होने लगा की मैं गलत रास्ते पर हूँ, पर मैं आगे बढ़ता रहा अचानक मेरी साइकिल की चेन उस घने जंगल में उतर गयी !

मैं साइकिल से उतरा और अपने साइकिल की चेन चढाने लगा साइकिल की चेन चढ़ा के जैसे ही साइकिल चलानी शुरु ही की थी कि फिर से चेन उतर गयी फिर से मैंने चेन चढ़ाई और फिर घर की और चलने को तैयार हुआ पर फिर चेन उतर गयी !

 मैं भी बहुत जिद्दी था ,मैं बार बार चेन चढ़ाता और बार बार चेन उतर जाती !

ये हादसा तक़रीबन २० बार हुआ होगा उसके बाद आवाज आई में भी देखता हू तू चेन कैसे चढ़ाता है!

मुझे कोई ललकारे मुझे कतई पसंद नहीं था, मैंने भी चेन लगते हुए ही जोर से बोला मैं भी देखता हू , किस माई के लाल में दम है जो मुझे चेन लगाने से रोकेगा और ये सिलसिला चलता रहा !

मैं बार बार चेन चढ़ाता और चेन फिर उतर जाती ये सब करते करते २ घंटे बीत गए ,मैं पसीने में तर हो चूका था तभी आवाज आयी मान गए तुझे न तू डरा ना तूने हार मानी तेरी जगह कोई और होता तो कब का साइकिल छोड़ के भाग चूका होता और जो डर जाता है वो हमारा शिकार होता है , पर तू बिलकुल भी नहीं डरा ना ही हार मानी हम सब तुझसे खुश है ,जा तू अपने घर निकल जा !


पहले तो मैं नशे में था इसलिए जब पहली आवाज आयी तो मैंने सोचा की कोई मुझे बोल रहा है पर अब ३ घंटे से ये सब होते होते मेरा नशा भी कम हो गया था !

मेरी नज़र अपने पास के पेड़ के ऊपर पड़ी तो उसपर सात सात सर कटे लोग बैठे हुए थे !

ये सब वही कर रहे थे अब मुझे थोड़ा डर तो लगा पर मैंने अपने चेहरे पर जाहिर नहीं होने दिया और साइकिल लेके पसीना पोंछते हुए घर की तरफ चल दिया !

थोड़ी दूर ही गया होगा कि एक पंडित बाबा साइकिल पर दिखे ,मैंने उस पंडित बाबा से पूछा "बाबा ये रतनपुर गांव कहाँ पड़ेगा !

उस पंडित ने मुस्कुराते हुए बोला , बेटा सीधे चला जा आगे रतनपुर गांव ही है !

मैंने साइकिल की पैण्डल तेज़ मारता हुआ आगे निकल गया ,पर अचानक मुझे एहसास हुआ कि दो बजे रात को कोई पंडित इस जंगल में क्या कर रहा है ,पीछे मुड़कर देखा तो कोई नहीं था !

मैं उस रात २:३० पर घर पहुंचा ,और फिर घोड़े बेंच कर सो गया !

अगले दिन उसे जंगल की कहानी पता चली कि उस जंगल से गुजर रहे सात लोगो को एक साथ डाकुओ ने लुटा और सातो का गाला काट कर मार डाला !

तब से ये सात सर कटे लोग उसी जंगल में रहते है ,उस जंगल से गुजरने वाले एक पंडित जी को भी डाकुओ ने चाकू घोप कर

मार डाला था ,और उनका सब लूट लिया था !

ये सब कहानी सुनकर मुझे सब समझ आ गया, उस दिन के बाद मैं हिसाब से ही ताड़ी पीता और समय पर घर चला जाता था !


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