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Pawan Gupta

Inspirational


4.5  

Pawan Gupta

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किस्मत

किस्मत

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फ़रवरी के खिलखिलाती धूप में अपने ही घर के आँगन में बैठी लक्छमी अपने अतीत के पन्नो को खंगाल रही थी।

उस सुहावनी धूप में ठंढी हवाओं के झोकों से उसका मन अतीत में डूबता चला जाता।उसके आँगन के बीचोबीच एक एक आम का पेड़ था और चारो तरफ रंग बिरंगे फूलो की क्यारिया बनी थी।वही आँगन के एक तरफ उसका कार्यालय था। 

 वो उसी के पास आंगन में पड़ी चारपाई पर बैठी चाय की गर्म चुस्की लेते हुए अपने अतीत में गोते लगाने लगी !

7 साल पहले यही तो महीना था जब बिरजू के बापू उसे बियाह के अपने गांव मरवटिया लाये थे। बिरजू उसका बड़ा बेटा था। बिरजू के बाबूजी बड़े ही अच्छे कद काठी के रोबदार आदमी थे।

गांव में जानकार भी थे 3 साल पहले ऐसी घटना घटी कि सब बदल गया सन 1990 की बात है मरवटिया जो उतर प्रदेश का एक गांव है वहां कुछ प्रोग्राम के लिए शहर से गांव के मुखिया ने कुछ कलाकारों को बुलाया था।

  उसी रात बिरजुआ के बाबूजी भी उस प्रोग्राम में रखवाली करने के के लिए मुखिया के कहने पर गए थे। रात का प्रोग्राम था डांसर को भी बुलाया गया था।

  बिरजुआ के बाबूजी क्या बन ठन के निकले थे वो कड़कदार धोती सफ़ेद कुरता उसपर नेहरू जैकेट के साथ सर पर केसरी पगड़ी क्या जच रही थी एक माथे पर लम्बा तिलक और मुछो पर ताव देते हुए क्या गजब नज़र आ रहे थे।

 उन्होंने अपने रुआब को बढ़ाने के लिए मुखिया जी से दो नाली बंदूख भी ली थी और अपने कंधे पर टांग बड़े इतराते हुए बोले ... बता बिरजुआ की माई मैं कैसा दिख रहा हूँ। मैं बोल दी आप तो हीरो लग रहे हो......

   ए जी सुनिए न मुझे भी ले चलिए तो वो गुस्सा के बोले बिरजुआ के माई तू घर पर रह हमारे घर की औरते बहार नहीं जाती है रात बिरात का टाइम है। चार चार बच्चे है संभाल उसे !

    हमारी घर की औरते घर से बहार पैर नहीं रखती। ये बोलते हुए बिरजुआ के बाबूजी कुछ उखड के चले गए थे।

   वहा उस रात प्रोग्राम बहुत अच्छे से चल रहा था। रंगारंग कार्यक्रम लड़कियों के डांस सब बहुत एन्जॉय कर रहे थे। तभी गाँव के मुखिया के दुश्मनो में हमला कर दिया। हर जगह दनादन गोलिया चलने लगी। सब अपनी अपनी जान बचाकर भागने लगे मुखिया के आदमियों ने भी इधर से बचाओ में गोलिया चलाई पर कुछ खास फ़ायदा न हुआ। बिरजुआ के बाबूजी की गोलिया खत्म हो गई तो वो वही पास में बनी फुस की झोपडी में छिप गए।उन्हें छिपते हुए देख दो डांसर लड़किया भी उस झोपडी में अपनी जान बचाने की सोच के छिप गए पर उन डांसरो को छिपते हुए मुखिया के दुश्मनो ने देख लिया और उस झोपडी में आग लगा दी...

   आग की लपटों ने झोपडी को यूँ अपने आगोश में ले लिया जैसे बादल सूरज को ढक लेता है। उस आग में तीनो जल के मर गए ...

    मुखिया के दुश्मनी की आग में आज गाँव के बहुत लोग तबाह हो गए थे और बिरजुआ के बाबूजी भी ना रहे उधर बिरजुआ की माँ का भी बुरा हाल था। जल्दी शादी होने के कारण अभी वो जवान ही थी चार - चार बेटो का बोझ सर पर था। उसका मन करता की वो मर जाए पर चार -चार बच्चो का मुँह देख के दिल तड़प उठता ...

    उधर मुखिया को व् बिरजुआ के बाबूजी के जाने का बड़ा दुःख था।मुखिया को भी पता था की बिरजुआ की माँ के लिए जीवन बहुत ही दूभर होने वाला है।

   इसीलिए मुखिया ने लक्ष्मी को सपोर्ट करके बी डी सी के चुनाव में खड़ा कर दिया मुखिया को पता था कि पुरे गाँव वालो की सहानुभूति लक्ष्मी के साथ ही होगी और लक्ष्मी जीत ही जाएगी।

   और हुआ भी ऐसा ही लक्ष्मी बी डी सी की चुनाव भारी मतों से जीत गई। आज वो एक अच्छी कार्यकर्ता बन के उभरी है पुरे गाँव में उसकी बात को काटने वाला कोई नहीं रहा गाँव का कोई भी मसला हो वो ही निपटारा करती पुलिस भी उसके न्याय से सहमत होते ..... 

 आज वही औरत जिसे घर से बहार जाने की आजादी ना थी वो पूरा गाँव चला रही थी। क्या किस्मत थी इसी पुरानी याओं में खोई लक्ष्मी मुस्कुरा ही रही थी कि ....

उसके आँगन में भागता हाफ़ते रवि शंकर पांडेय आया और हाफ़ते हुए बोला.. बड़की मैया ( गाँव के लोग इज़्ज़त से बड़की मैया बोलते थे ) जल्दी चलो गाँव में लड़ाई हो गई है ....

 रवि शंकर की बात सुनते ही लक्ष्मी अटपटाई सी अपने यादों के पन्नो को समेटते हुए बाहर आई और बोली .....का हुआ से रवि बिटुआ कौन लड़ बैठा ..???

रवि शंकर बोला बड़की माई वो चौरसिया और विदेसिया के घर में लड़ाई हो गई है जल्दी चलिए पुलिस वाले भी आये है .

लक्ष्मी बोली चल रवि शंकर बिटुआ देखते है क्या किया इन अभागों ने ......


ये कहते हुए लक्ष्मी उठी और रवि शंकर को लेकर चल पड़ी अपनी नए न्याय को करने .....      

       


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