वो आखिरी मुलाकात
वो आखिरी मुलाकात
पहाड़ों की उस ठंडी शाम में, चाय की प्याली से उठता धुआं समीर की आंखों के सामने धुंध पैदा कर रहा था। सामने वाली कुर्सी खाली थी, लेकिन वहां रखी डायरी और एक आधा जला हुआ गुलाब इस बात की गवाही दे रहे थे कि कोई अभी-अभी वहां से उठा है।
समीर ने कैफे की खिड़की से बाहर देखा। बर्फ़बारी शुरू हो चुकी थी। सालों बाद वो और ईशा इस मोड़ पर मिले थे, जहां रास्ते जुदा होने के लिए ही बने थे।
"तुम जा रही हो?" समीर ने धीमे से पूछा था।
ईशा ने अपनी बैग की स्ट्रैप को कसकर पकड़ा और उसकी आंखों में देखते हुए कहा, "कुछ कहानियों का पूरा होना उनके खूबसूरत होने से ज्यादा दर्दनाक होता है, समीर। हम अगर आज नहीं रुके, तो कल एक-दूसरे को खो देंगे।"
समीर के पास कहने को बहुत कुछ था। वो कहना चाहता था कि दस साल का इंतज़ार कोई छोटी बात नहीं होती। वो कहना चाहता था कि उसके पास अब भी वो पुरानी चिट्ठियां सुरक्षित हैं। पर उसके शब्द उसके गले में ही अटक कर रह गए।
ईशा उठी, उसने अपनी डायरी का एक पन्ना फाड़ा और उस पर कुछ लिखकर मेज पर रख दिया। बिना पीछे मुड़े, वो कैफे के दरवाजे से बाहर निकल गई। समीर उसे जाते हुए देखता रहा, जब तक कि उसका लाल कोट बर्फ की सफेदी में ओझल नहीं हो गया।
समीर ने कांपते हाथों से वो कागज उठाया। उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी:
"अगर हम फिर कभी मिले, तो अजनबी बनकर मिलना... ताकि मैं तुम्हें फिर से चाहने की गलती कर सकूं।"
समीर ने खिड़की से बाहर देखा। सड़क अब पूरी तरह सुनसान थी। उसने अपनी चाय का आखिरी घूंट भरा, जो अब कड़वी और ठंडी हो चुकी थी। उसने डायरी उठाई और कैफे से बाहर निकल गया, लेकिन उस दिशा में नहीं जहां ईशा गई थी, बल्कि उस दिशा में जहाँ से वह कभी आया ही नहीं था।
कहानी यहाँ रुक गई है...
क्या समीर ने ईशा का पीछा किया होगा? या क्या सालों बाद किसी मोड़ पर वो सच में अजनबी बनकर मिले होंगे? कुछ सवालों के जवाब न मिलना ही शायद इस कहानी की खूबसूरती है।

