STORYMIRROR

रूही शाह🌘

Inspirational

4.5  

रूही शाह🌘

Inspirational

"मेरी रूह शायद अब किसी का इंतज़ार नहीं करती।"

"मेरी रूह शायद अब किसी का इंतज़ार नहीं करती।"

2 mins
4

यह पंक्तियाँ मन के उस कोने को छूती हैं जहाँ अब शोर नहीं, सिर्फ एक गहरा ठहराव है।
वो आखिरी दहलीज़
शहर की भागदौड़ से दूर, पुराने नीम के पेड़ के नीचे बनी उस बेंच पर बैठना मेरी आदत बन गई थी। लोग आते थे, चले जाते थे। कोई किसी का हाथ थामे हँसता, तो कोई फोन पर किसी के इंतज़ार में घड़ी देखता। मैं बस देखती थी। पर मेरे भीतर अब कोई हलचल नहीं थी।
एक वक्त था जब दरवाज़े पर होने वाली हर दस्तक मेरी धड़कन बढ़ा देती थी। जब फोन की हर रिंग पर लगता था कि शायद 'वो' लौट आया है। बेतहाशा उम्मीदों का एक बोझ था, जो मैंने सालों तक अपने कंधों पर ढोया था। हर रात चाँद से यही पूछती थी कि क्या उसे मेरी याद नहीं आती? क्या मेरी रूह का आधा हिस्सा कभी पूरा होगा?
पर आज, हवा का झोंका आया और मेरे सूखे बालों को चेहरे पर बिखेर गया। मैंने उन्हें सलीके से पीछे किया और गहरी साँस ली। न नज़रों में कोई तलाश थी, न दिल में कोई बेचैनी।
"मेरी रूह शायद अब किसी का इंतज़ार नहीं करती।"
यह एहसास अचानक नहीं आया। यह उन रातों की देन है जब रोते-रोते आँखें थक गई थीं। यह उस खामोशी का नतीजा है जो तब मिली जब मैंने खुद से प्यार करना सीखा। अब अगर कोई लौट भी आए, तो शायद मुझे फर्क न पड़े। क्योंकि अब मैंने उस खालीपन को ही अपना घर बना लिया है।
अधूरेपन में भी एक मुकम्मल सुकून है। अब मुझे किसी के 'आने' की खुशी नहीं चाहिए, क्योंकि अब मुझे किसी के 'जाने' का डर नहीं है। मैं अब किसी कहानी का हिस्सा नहीं, बल्कि खुद में पूरी एक किताब हूँ।
सूरज ढल रहा था। मैंने अपना झोला उठाया और घर की ओर चल दी। पीछे मुड़कर नहीं देखा, क्योंकि अब वहाँ कोई नहीं था जिसे देखना बाकी हो।



Rate this content
Log in

Similar hindi story from Inspirational