अकेलेपन की धूप, खुद की छाँव
अकेलेपन की धूप, खुद की छाँव
यह एक ऐसी कहानी है जो हमें याद दिलाती है कि कभी-कभी सबसे खूबसूरत सफर वह होता है जो हम खुद के साथ तय करते हैं।
अकेलेपन की धूप, खुद की छाँव
आर्यन अक्सर पहाड़ों की वादियों में गुम होना पसंद करता था। इस बार वह कसोल की पहाड़ियों पर था। कैंपफायर के चारों ओर लोग जोड़ों में बैठे थे, कोई अपने पार्टनर का हाथ थामे था, तो कोई दोस्तों के साथ ठहाके लगा रहा था।
आर्यन एक कोने में अपनी कॉफी का मग पकड़े चुपचाप जलती हुई लकड़ियों को देख रहा था। उसे देखकर एक बुजुर्ग व्यक्ति, जो वहीं पास में बैठे थे, मुस्कुराए और बोले, "बेटा, अकेले सफर करना थोड़ा अधूरा सा नहीं लगता? क्या तुम्हें कोई हमसफर नहीं चाहिए?"
आर्यन ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "ज़रूरी नहीं हर सफर में हमसफर ही हो, बाबा। कभी-कभी खुद का साथ पाने के लिए अकेला चलना ज़रूरी होता है।"
तलाश बाहर नहीं, भीतर है
आर्यन हमेशा से ऐसा नहीं था। एक वक्त था जब वह बिना दोस्तों या बिना किसी के साथ के घर से बाहर कदम भी नहीं रखता था। लेकिन एक ब्रेकअप और कुछ रिश्तों की कड़वाहट ने उसे सिखाया कि जब तक आप खुद के साथ खुश रहना नहीं सीखते, दुनिया की कोई भी भीड़ आपका अकेलापन दूर नहीं कर सकती।
उस रात, आर्यन ने किसी से बात नहीं की। उसने बस सितारों भरे आसमान को देखा। उसने वह किताब पढ़ी जो उसने महीनों से अधूरी छोड़ी थी। उसने ठंडी हवाओं को महसूस किया और पहली बार उसे महसूस हुआ कि उसे किसी के 'हाँ' या 'ना' की ज़रूरत नहीं थी।
सफर का असली मतलब
अगली सुबह जब वह ट्रैकिंग पर निकला, तो रास्ते में कई मोड़ आए। कुछ लोग थक कर रुक गए, कुछ वापस मुड़ गए। आर्यन चलता रहा। जब वह चोटी पर पहुँचा, तो नज़ारा अद्भुत था। सूरज की पहली किरणें पहाड़ों को सुनहरा बना रही थीं।
वहाँ शांति थी। कोई शोर नहीं, कोई उम्मीद नहीं, और कोई शिकायत नहीं। उसे अहसास हुआ कि अगर उसके साथ कोई और होता, तो शायद वह उस सुकून को उतनी गहराई से महसूस नहीं कर पाता। वह शायद बातों में उलझा होता या सामने वाले की थकान की चिंता कर रहा होता।
एक नई पहचान
सफर से लौटते वक्त आर्यन के चेहरे पर एक अलग ही चमक थी। उसने समझ लिया था कि:
खुद की संगति (Company): दुनिया का सबसे वफादार साथी आप खुद हैं।
आजादी: अकेले सफर करने का मतलब है अपनी मर्जी का मालिक होना।
आत्म-मंथन: सन्नाटे में ही हमें अपनी असली आवाज़ सुनाई देती है।
सफर खत्म हुआ, लेकिन आर्यन की खुद से दोस्ती की शुरुआत हो गई। उसने जान लिया था कि रास्ते चाहे कितने भी लंबे क्यों न हों, अगर आपके पास खुद का साथ है, तो आप कभी अकेले नहीं हैं।
"मंज़िलें मिल ही जाएँगी भटकते हुए ही सही, गुमराह तो वो हैं जो घर से निकले ही नहीं।"
