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रूही शाह🌘

Inspirational

4.5  

रूही शाह🌘

Inspirational

​लापतागंज: एक सपनों की दुनिया

​लापतागंज: एक सपनों की दुनिया

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यह कहानी है सिया की, जिसकी आँखों में हज़ारों सपने पलते थे, लेकिन उसकी दुनिया उस 'लापतागंज' में सिमटी हुई थी जहाँ हर चीज़ गुमशुदा थी—कभी लोगों की उम्मीदें, तो कभी उनके अपने वजूद।
लापतागंज: एक सपनों की दुनिया
लापतागंज कोई साधारण गाँव नहीं था। यहाँ की दीवारों पर पुराने विज्ञापनों की जगह अधूरी ख्वाहिशें लिखी होती थीं। सिया यहाँ एक पुरानी लाइब्रेरी के कोने में बैठकर अपनी डायरी लिखती थी। उसके लिए लापतागंज सिर्फ़ एक जगह नहीं, बल्कि एक अहसास था—जहाँ सब कुछ खोया हुआ था, सिवाय उसके सपनों के।
सिया का पहला सपना
सिया का सपना था एक ऐसी कहानी लिखना, जिसे पढ़कर लोग अपनी खोई हुई मुस्कान वापस पा सकें। वह अक्सर गाँव के चौराहे पर खड़ी होकर पुरानी "धुंधली घड़ी" को देखती, जो सालों पहले रुक चुकी थी। गाँव वाले कहते थे कि जब इस गाँव का कोई सपना सच होगा, यह घड़ी फिर से टिक-टिक करने लगेगी।
मोड़: जब हकीकत सपनों से टकराई
एक शाम, सिया को लाइब्रेरी की धूल भरी अलमारियों में एक पुराना नक्शा मिला। उस नक्शे पर लिखा था—"सपनों का पता"। सिया को समझ आया कि लापतागंज के लोग असल में कहीं गए नहीं हैं, बस उन्होंने समाज के डर से अपने सपनों को 'लापता' कर दिया है।
उसने तय किया कि वह अपनी कहानी का नाम 'लापतागंज' ही रखेगी। उसने लिखना शुरू किया:
उन गलियों के बारे में जहाँ बचपन की यादें खो गई थीं।
उन लोगों के बारे में जिन्होंने हकीकत के चक्कर में जुनून को मार दिया था।
सपनों की नई सुबह
जैसे-जैसे सिया की कहानी आगे बढ़ी, गाँव के लोगों को अपनी पहचान याद आने लगी। किसी ने बरसों बाद हारमोनियम निकाला, तो किसी ने अपनी अधूरी पेंटिंग पूरी की।
अचानक, उस रात एक चमत्कार हुआ। चौराहे पर लगी वह 'धुंधली घड़ी' ज़ोर से गूँज उठी। लापतागंज अब गुमशुदा नहीं था; वह अब 'सपनों का गंज' बन चुका था। सिया ने मुस्कुराते हुए अपनी डायरी बंद की और आखिरी पन्ने पर लिखा— "यहाँ अब कुछ भी लापता नहीं है।"


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