एक आखिरी शाम
एक आखिरी शाम
यह कहानी उन पन्नों के बारे में है जिन्हें हम अक्सर मोड़ना नहीं चाहते, लेकिन किताब पूरी करने के लिए वह जरूरी होता है।
अंत की शुरुआत: 5 साल और एक आखिरी शाम
पाँच साल—यानी 1,825 दिन। इतने वक्त में इंसान की आदतें, उसकी पसंद, यहाँ तक कि उसके बोलने का तरीका भी दूसरे इंसान जैसा होने लगता है। समीर और आयशा के लिए यह सिर्फ एक रिश्ता नहीं था, यह एक पूरी दुनिया थी जिसे उन्होंने कॉलेज के कैंटीन से लेकर ऑफिस की भागदौड़ के बीच बनाया था।
लेकिन आज, उस दुनिया की आखिरी शाम थी।
वह आखिरी मुलाकात
शहर के उसी पुराने कैफे में, जहाँ उन्होंने पहली बार 'आई लव यू' कहा था, आज सन्नाटा कुछ ज्यादा गहरा था। मेज पर रखी कॉफी ठंडी हो चुकी थी। न कोई झगड़ा था, न कोई चिल्लाहट; बस एक भारी शांति थी।
समीर ने आयशा की तरफ देखा और धीमी आवाज में कहा, "क्या हम वाकई इसे यहीं छोड़ रहे हैं?"
आयशा ने खिड़की के बाहर देखते हुए जवाब दिया, "समीर, हम एक-दूसरे को पकड़कर रखने की कोशिश में खुद को खो रहे हैं। पाँच साल पहले हम जो थे, आज वह नहीं रहे। अब हम साथ तो हैं, पर साथ खुश नहीं हैं।"
'द आर्ट ऑफ लेटिंग गो' (जाने देने की कला)
रिश्ता खत्म करना मुश्किल नहीं होता, मुश्किल होता है उस 'भविष्य' को छोड़ना जो आपने साथ में बुना था। समीर ने महसूस किया कि 'लेटिंग गो' का मतलब नफरत करना नहीं, बल्कि स्वीकार करना है।
उस शाम उन्होंने कुछ खास बातें कीं:
* शिकायतों का अंत: उन्होंने एक-दूसरे पर इल्जाम लगाने के बजाय उन यादों के लिए शुक्रिया कहा जिन्होंने उन्हें बेहतर इंसान बनाया।
* आजादी का अहसास: आयशा ने कहा, "मैं तुम्हें आजाद नहीं कर रही, मैं खुद को उस उम्मीद से आजाद कर रही हूँ जो अब हमारे बीच नहीं बची।"
विदाई का वह पल
जब वे कैफे से बाहर निकले, तो हवा में एक अजीब सी हल्कापन था। 5 साल का बोझ जैसे एक झटके में उतर गया हो।
समीर ने हाथ आगे बढ़ाया। आयशा ने उसे थामने के बजाय बस मुस्कुराकर सिर हिलाया। यह दूरी अब जरूरी थी। वे दोनों अलग-अलग दिशाओं में मुड़ गए। पीछे मुड़कर न देखना शायद उस रिश्ते के प्रति उनकी आखिरी वफादारी थी।
सीख: कभी-कभी प्यार का सबसे बड़ा सबूत एक-दूसरे को जाने देना होता है। 'द आर्ट ऑफ लेटिंग गो' यह सिखाती है कि कुछ चीजें टूटने के लिए ही होती हैं, ताकि हम फिर से जुड़कर कुछ नया बन सकें।

