'आखरी मुलाकात'
'आखरी मुलाकात'
यह कहानी है अर्जुन और मीरा की, जिनके लिए 'आखरी मुलाकात' एक अंत नहीं, बल्कि एक खूबसूरत याद का हिस्सा बन गई।
बिछड़ने की वो शाम
शहर के एक पुराने रेलवे स्टेशन का प्लेटफॉर्म नंबर 4। ट्रेन आने में अभी आधा घंटा बाकी था। अर्जुन और मीरा बेंच पर बैठे थे, पर उनके बीच की खामोशी स्टेशन के शोर से कहीं ज़्यादा तेज़ थी। अर्जुन का तबादला दूसरे शहर हो गया था, और दोनों जानते थे कि लॉन्ग-डिस्टेंस रिलेशनशिप उनके लिए मुमकिन नहीं होगा।
मीरा ने ठंडी सांस भरते हुए कहा, "तो... यह सच में हमारी आखरी मुलाकात है?"
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा और धीमी आवाज़ में बोला, "मुलाकातें आखिरी तब होती हैं मीरा, जब यादें खत्म हो जाएं। हम बस अब अलग रास्तों पर चल रहे हैं।"
यादों का पिटारा
उस आखिरी आधे घंटे में उन्होंने कोई बड़ी कसमें नहीं खाईं, न ही रोना-धोना किया। इसके बजाय, उन्होंने उन छोटी बातों को याद किया जिन्होंने उन्हें जोड़ा था:
* वो पहली बार बारिश में एक ही छतरी के नीचे कचौड़ी खाना।
* बिना किसी बात के घंटों तक सड़कों पर पैदल घूमना।
* और वो छोटी-छोटी लड़ाइयां, जो हमेशा एक मुस्कुराहट पर खत्म होती थीं।
मीरा ने अर्जुन के हाथ में एक छोटी सी डायरी थमाई और कहा, "इसे तब खोलना जब बहुत अकेले हो। इसमें हमारे हर उस पल का जिक्र है जो हमने साथ जिया है।"
विदाई का पल
ट्रेन की सीटी बजी। अर्जुन अपना सामान लेकर कोच के दरवाज़े पर खड़ा हो गया। ट्रेन धीरे-धीरे रेंगने लगी। मीरा प्लेटफॉर्म पर उसके साथ-साथ चलने लगी।
दोनों की आँखें नम थीं, पर चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी। अर्जुन ने चिल्लाकर कहा, "अपना ख्याल रखना मीरा! और याद रखना, हम जहाँ भी रहें, ये आसमान एक ही रहेगा।"
मीरा वहीं रुक गई और हाथ हिलाते हुए उसे ओझल होते देखती रही। उस 'आखरी मुलाकात' ने उन्हें दुखी नहीं किया, बल्कि उन्हें एक-दूसरे का शुक्रिया अदा करने का मौका दिया—उस वक्त के लिए जो उन्होंने साथ बिताया था।
कहानी का संदेश
अक्सर हम "आखरी मुलाकात" को एक दुखद अंत मान लेते हैं, लेकिन कभी-कभी यह एक ग्रेसफुल (सुरुचिपूर्ण) विदाई होती है, जो हमें बिना किसी कड़वाहट के आगे बढ़ने की हिम्मत देती है।
क्या आप चाहेंगे कि मैं इस कहानी का दूसरा भाग लिखूँ, जिसमें कई सालों बाद उनकी दोबारा मुलाकात होती है?

