"क्या हम इस कहानी को लाइब्रेरी के बाहर भी जारी रख
"क्या हम इस कहानी को लाइब्रेरी के बाहर भी जारी रख
यह कहानी है शहर की उस पुरानी लाइब्रेरी की, जहाँ किताबों की खुशबू और सन्नाटे के बीच एक अनकही मोहब्बत पनपी।
किरदारों की मुलाकात
आर्यन इंजीनियरिंग का छात्र था, जिसे शोर-शराबे से नफरत थी। वहीं ईशा साहित्य (Literature) की दीवानी थी। वे दोनों रोज़ दोपहर 3 बजे लाइब्रेरी की 'सेक्शन C' वाली उसी पुरानी मेज पर आमने-सामने बैठते थे।
हफ्तों बीत गए, पर उनके बीच कोई बात नहीं हुई। बस कभी-कभी नजरें मिलतीं और एक-दूसरे को देखकर हल्की सी मुस्कुराहट। आर्यन अक्सर अपनी भारी-भरकम किताबों के पीछे से ईशा को 'गुलज़ार' की नज़्में पढ़ते हुए देखता रहता।
कागजों का सिलसिला
एक दिन ईशा अपनी कुर्सी से उठी, तो उसकी किताब से एक छोटा सा कागज का टुकड़ा नीचे गिर गया। आर्यन ने उसे उठाया, उस पर लिखा था:
"खामोशियाँ भी बहुत कुछ कहती हैं, बस सुनने वाला चाहिए।"
अगले दिन, आर्यन ने भी हिम्मत जुटाई। जब ईशा अपनी जगह से उठी, तो उसने एक बुकमार्क उसकी किताब में रख दिया, जिस पर लिखा था:
"लाइब्रेरी का ये कोना अब मेरा पसंदीदा है, सिर्फ किताबों की वजह से नहीं।"
शब्दों से दिल तक
महीनों तक यह सिलसिला चलता रहा। वे एक-दूसरे से बात नहीं करते थे, लेकिन किताबों के पन्नों में छोड़ी गई चिट्ठियां उनकी दुनिया बन चुकी थीं। आर्यन उसे मुश्किल गणित के सवालों के बीच छुपे 'दिल' बना कर देता, और ईशा उसे प्रेम कविताओं की पंक्तियाँ भेजती।
एक शाम, जब बारिश बहुत तेज हो रही थी, लाइब्रेरी बंद होने का समय हो गया। आर्यन अपनी मेज समेट रहा था कि तभी ईशा उसके पास आई। उसने अपनी पसंदीदा किताब 'अमृता प्रीतम की रसीदी टिकट' आर्यन की तरफ बढ़ाई।
उस किताब के पहले पन्ने पर ईशा का फोन नंबर लिखा था और नीचे एक लाइन:
"क्या हम इस कहानी को लाइब्रेरी के बाहर भी जारी रख सकते हैं?"
एक नई शुरुआत
आर्यन ने मुस्कुराते हुए किताब थाम ली। उस दिन लाइब्रेरी की उस पुरानी मेज ने दो अजनबियों को हमेशा के लिए एक कर दिया। आज भी जब वे मिलते हैं, तो किताबों की वही पुरानी खुशबू उनके प्यार को ताज़ा कर देती है।
"कुछ कहानियाँ शब्दों से नहीं, एहसासों से लिखी जाती हैं।"
क्या आप चाहेंगे कि मैं इस कहानी का अगला हिस्सा लिखूँ या इस थीम पर कोई छोटी सी कविता सुनाऊँ?

