"जाना ज़रूरी है क्या?"
"जाना ज़रूरी है क्या?"
यह कहानी है समीर और ईशा की। दोनों एक ही कॉलेज में पढ़ते थे, लेकिन स्वभाव से बिल्कुल अलग। समीर थोडा शांत और अपनी दुनिया में रहने वाला, जबकि ईशा चुलबुली और हर बात का जवाब ढूंढने वाली।
उनके बीच दोस्ती तो गहरी थी, पर एक सवाल ईशा को हमेशा परेशान करता था— "जाना ज़रूरी है क्या?"
वो आखिरी मुलाकात
कॉलेज का आखिरी दिन था। समीर को आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे शहर जाना था। शाम को दोनों झील के किनारे बैठे थे। शहर की रोशनी पानी में चमक रही थी, लेकिन दोनों के बीच एक भारी ख़ामोशी थी।
ईशा ने धीमी आवाज़ में पूछा, "समीर, सच में... जाना ज़रूरी है क्या? क्या हम यहाँ रहकर कुछ नहीं कर सकते?"
समीर ने उसकी आँखों में देखा और मुस्कुराया, पर उस मुस्कुराहट में थोडा दर्द था। उसने कहा, "ईशा, कुछ रास्ते ऐसे होते हैं जहाँ अकेले चलना पड़ता है ताकि हम कल साथ चलने के काबिल बन सकें। जाना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि अगर मैं आज नहीं गया, तो शायद हम कभी वो नहीं बन पाएंगे जो हम बनना चाहते हैं।"
दूरियां और एहसास
समीर चला गया। शुरू में फ़ोन कॉल्स लंबे होते थे, फिर धीरे-धीरे काम और समय की कमी ने फासले बढ़ा दिए। ईशा को अक्सर लगता कि शायद समीर उसे भूल गया है। पर समीर के लिए, हर गुज़रता दिन ईशा की अहमियत और बढ़ा रहा था।
उसे एहसास हुआ कि दूर जाना सिर्फ़ करियर के लिए नहीं था, बल्कि यह समझने के लिए भी था कि ईशा उसकी ज़िंदगी में क्या मायने रखती है। अक्सर हम पास रहकर अपनों की कीमत भूल जाते हैं।
सालों बाद की वापसी
दो साल बाद, ईशा अपने ऑफिस के बाहर खड़ी बारिश का इंतज़ार कर रही थी। तभी एक छाता उसके सिर पर आया। उसने मुड़कर देखा—वो समीर था। वह पहले से ज़्यादा मैच्योर और शांत लग रहा था।
ईशा की आँखों में आंसू आ गए। उसने फिर वही पुराना सवाल दोहराया, "क्या वाकई तुम्हारा जाना ज़रूरी था?"
समीर ने उसका हाथ पकड़ा और कहा, "हाँ, ईशा। जाना ज़रूरी था ताकि मैं यह समझ सकूं कि पूरी दुनिया घूमने के बाद भी मेरा सुकून सिर्फ तुम्हारे पास है। अगर मैं नहीं जाता, तो मैं तुम्हारी कमी कभी महसूस नहीं कर पाता।"
कहानी का सार
कभी-कभी रिश्तों में 'जाना' या 'दूरी' अंत नहीं होती, बल्कि एक नई और मज़बूत शुरुआत होती है। फासले हमें यह सिखाते हैं कि कौन हमारा अपना है और किसके बिना हम अधूरे हैं।
क्या आप चाहते हैं कि मैं इस कहानी का कोई और अंत लिखूँ या इसे किसी और अंदाज़ में विस्तार दूँ?

