Sushma s Chundawat

Classics


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Sushma s Chundawat

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विचारणीय प्रश्नोत्तर

विचारणीय प्रश्नोत्तर

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"मम्मी ये हर कहानी में ऐसा ही होता है कि लड़की पढ़ी-लिखी होती है, फिर उसकी शादी हो जाती है, शादी के बाद उसका जाॅब करना पति को पसंद नहीं आता तो वो त्यागपत्र देकर घर बैठ जाती है पर समय के साथ-साथ उसका पति उसे अपमानित करने लगता है तो वह अपना खोया हुआ सम्मान पाने के लिए वापस किसी ना किसी तरह से नौकरी हासिल कर लेती है और साबित करती है कि वह भी किसी से कम नहीं !"- बिटिया ने अपनी पढ़ी हुई महिला सशक्तिकरण की कहानियों का सार बताया।

"हाँ तो बेटा ?" मेरी समझ में नहीं आया कि वो क्या कहना चाह रही है !

"आपको नहीं लगता कि हर कहानी में पुरुष को एक खलनायक के रूप में पेश किया जाता है जिसका एकमात्र मकसद अपनी ही पत्नी को नीचा दिखाना होता है ?" - बेटी ने प्रतिप्रश्न किया।

मैंने कभी ऐसा सोचा तो नहीं था पर जब बेटी ने इस ओर मेरा ध्यान खींचा तो लगा कि हाँ, ऐसा ही तो है..

हर कहानी अंततोगत्वा यही संदेश देती है कि पुरुष वर्ग अत्याचारी है और हर महिला अपने कुचले आत्मसम्मान को वापस पाने हेतु संघर्षरत ।

"तो इसमें गलत क्या है बच्चे ?"- मैंने पूछा ।

"गलत क्यों नहीं है मम्मा ! इस टाइप की कहानियों में पुरुष को हर प्रकार से जुल्मी ही दिखाया जाता है जबकि अत्याचारी महिलायें भी होती हैं !"

"महिला और अत्याचारी ? ? ये क्या बोल रही हो बेटा ! "- मैंने प्रतिवाद किया।

"हाँ मम्मा, किसी दहेज के केस में देखो, सास, ननद मिलकर दबाव डालती है तब जाकर पति अपनी पत्नी को प्रताड़ित करने लगता है...

बच्चे के लिए और वो भी लड़का हो, ये ख्वाहिश दादी के मन में ही सबसे ज्यादा हिलोरें लेती है।

औरतें ही सबसे ज्यादा रंग-रूप को लेकर मीन-मेख निकालती है, माँ को सबसे ज्यादा चिंता इस बात की क्यों होती है कि मेरी लड़की काली है, मोटी है, दुबली है, छोटी है, क्यों ? ? माँ उनके आंतरिक रूप और चरित्र को निखारने की बजाय बाहरी रूप को क्यों तवज्जों देती हुई चेहरे पर मलने का उबटन हाथ में थमाती है ?

क्यों हर लड़की को यह कह कर डराया जाता है कि ससुराल में सास चार बातें सुनाएगी अगर रोटी गोल नहीं बनी तो ! क्योंकि सच भी यही है कि ताने मारने की शुरुआत सास की तरफ से ही होती है।

और क्या सिर्फ लड़के धोखा देते हैं प्रेम में, लड़कियाँ कभी धोखा नहीं देती ? " - बेटी रोष में भरकर बोली।

"तो तुम क्या सोचती हो कि पुरुष वर्ग निर्दोष है ?"- मैंने सवाल दागा ।

" नहीं मम्मा, मैं किसी एक वर्ग की प्रशंसा या बुराई नहीं कर रही, मैं सिर्फ यह सोचती हूँ कि महिला और पुरुष दोनों में अच्छाई और बुराई दोनों गुण समाहित होते हैं पर सिर्फ पुरुष को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है, कहीं ना कहीं उन्हें किसी महिला का समर्थन प्राप्त होता है जो उन्हें उकसाता है, हर पुरुष गलत नहीं होता है ।"- बेटी ने जवाब दिया।

"तो जो व्यक्ति अपनी पत्नी को शराब पीकर मारता-पीटता है या किसी नारी के साथ कोई पुरुष जबर्दस्ती करता है, उनके बारे में तुम्हारी क्या सोच है ? उन्हें कौन भड़काता है जो वो ऐसी हरकतें करते हैं ?"- मैं प्रश्न पर प्रश्न किये जा रही थी।

"मम्मा, मैं ऐसे गलत पुरुषों की वकील नहीं जो उन्हें बचाने के लिए किसी लड़की या महिला के चरित्र पर छींटे उडाऊं, यकीनन ऐसे लोग विकृत मानसिकता वाले होते हैं परन्तु यदि इस समस्या की जड़ में जाकर देखा जाए तो हम पायेंगे कि या तो उनकी शिक्षा प्रणाली में कमी थी जिस वजह से वो लोग नारी का सम्मान करना नहीं सीखे या फिर उनका पारिवारिक वातावरण ऐसा होता है कि मानवीय मूल्यों और संस्कारों, संवेदनाओं का परिचय भी उन्हें प्राप्त नहीं होता।"- बेटी का उत्तर आया ।

एलएलबी की छात्रा के पास मेरे हर प्रश्न का जवाब था, पर वकालत और जिरह करना तो मुझे भी विरासत में प्राप्त था इसलिए मैंने तुरंत उसे कुरेदा, " तो क्या करें ? सज़ा नहीं दे ऐसे लोगों को ?"

बेटी हंसी और बोली-" गलत करेंगे तो सजा तो पाएंगे ही और वो भी कड़ी से कड़ी सजा ताकि अगली बार वो तो क्या कोई भी ऐसी घिनौनी हरकत ना करे पर मेरा मानना है कि सजा के डर से अपराध रुके इससे अच्छा यह है कि अपराधी ही नहीं पनपें ।"

"कहना क्या चाहती हो ?"- मुझे बात समझ नहीं आयी।

"मम्मा जब सुधार करना ही है तो प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था में ही सुधार किया जाए ताकि बचपन से हर बच्चे में अच्छे संस्कारों का प्रस्फुटन हो, चाहे वो लड़का हो या लड़की।

हमारे देश में आठवीं कक्षा तक फेल करने का नियम हटा दिया गया है जिसकी वजह से ना तो शिक्षक पढ़ाने पर ध्यान देते हैं और ना ही बच्चे पढ़ने पर, और तो और माइनस आठ नम्बर लाये हुए व्यक्ति भी शिक्षक बनकर बैठे हुए हैं ! अब आप ही बताओ, एक छोटी उम्र का बच्चा, जिसके घर का वातावरण भी दूषित हो और स्कूल में ऐसे शिक्षक हो जिन्हें खुद के विषय का ही ज्ञान नहीं, ऐसे अध्यापक से यह अपेक्षा करना कि वह विद्यार्थी को मानवीय मूल्यों की शिक्षा भी प्रदान करें, अकल्पनीय है।

ऐसे वातावरण में पले बच्चे के अपराधी बनने के चांस बहुत अधिक होते हैं।"

"तुम मुद्दे से भटक रही हो बेटा, बात यह थी कि पुरुष वर्ग अत्याचारी है या नहीं ?" - मैंने टोका ।

"समस्याओं में से नयी समस्या निकल ही आती हैं मेरी माँ.."- बिटिया मुस्कुराई और फिर बोली-" मैंने देखा है और नोटिस भी किया है कि मेरी कम लंबाई को लेकर हमेशा महिलाओं ने मुझे हीन महसूस करवाने की असफल कोशिश की है, किसी पुरुष ने नहीं !

मैंने देखा है कि मेरी आंखों पर चढ़े नज़र के चश्में से सिर्फ महिलाओं के माथे पर शिकन आती है, किसी पुरुष के नहीं, मेरी शादी नहीं हुई, इसकी चिंता महिलाओं को बहुत ज्यादा है, मैं किसी लड़के से बात करूं तो मोहल्ले की आंटियों की ही ताका-झाँकी होती है, तो सिर्फ पुरुषों को गलत कैसे बोल दूं मम्मा ! गलत मानसिकता की शिकार महिलायें भी होती हैं पर ज्यादातर कहानियां महिलाओं पर हुई हिंसा और उसके प्रतिवाद पर लिखी गई है, सोच बदलनी चाहिए हर पुरुष राम नहीं होता है तो रावण भी नहीं होता है और यदि हर महिला शूर्पनखा नहीं होती है तो सीता भी नहीं होती है।"

बहस और भी लम्बी हो सकती है, पक्ष और विपक्ष में कई मुद्दे शामिल किये जा सकते हैं पर विषय प्रासंगिक और सोचनीय अवश्य है।


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