थोड़ी कैकयी – थोड़ा राम
थोड़ी कैकयी – थोड़ा राम
"सुनो, ये भाईसाहब कह रहे हैं कि माँ नहीं रही।" उसने अपनी पत्नी से कहा।
पत्नी के चेहरे पर चौंकने के भाव आए लेकिन दो सेकण्ड में ही वह संभल कर बोली,
"तो! जब तुम्हारी माताजी ने दूसरे दोनों बेटों को उनकी सारी प्रोपर्टी दे दी, तो वे ही करेंगे जो करना है। हम सब को तो तो निकाल दिया था न। कितना भटके हम बेघर... आज इतने सालों से मुश्किल से रुपये जोड़कर हम बेटी की शादी करवा पा रहे हैं। इसमें मुझे कोई मनहूसियत नहीं चाहिए।"
"हाँ... वो तो है, लेकिन मैं बड़ा हूँ और आखिरी वक़्त में मुझे बहुत याद कर रही थी, ये बता रहे हैं।" पति ने बाहर से आए व्यक्ति की तरफ इशारा कर कहा।
"अच्छा!! कैकयी का कलयुगी रूप थी तुम्हारी माँ। पहले तो बेकसूर बेटे के परिवार को घर से ही निकाल दो, और फिर जब अंतिम संस्कार हो तो...हुंह।" पत्नी ने अपने माथे पर टीका पहनते हुए आगे कहा कि, "तुम अपनी बेटी की शादी में आओगे कि नहीं।"
"कन्यादान तो करूंगा ही। लेकिन..."
"लेकिन? मैं वहाँ नहीं जाने दूंगी।" पत्नी ने दरवाज़े की तरफ इशारा करते हुए कहा।
"नहीं मैं जाऊंगा भी नहीं। माँ की परिणति शायद यही है।"
पति ने थूक निगलते हुए आगे कहा कि, "लेकिन मैं यहाँ भी पार्टी वगैरह में शरीक नहीं हो पाऊंगा।"
"क्यों?" पत्नी ने तेज़ आवाज़ में पूछा।
पति ने भारी आवाज़ में उत्तर दिया,
"जब कैकयी किसी न किसी रूप में आ रही है तो राम भी तो थोड़ा-बहुत..."
